बीते सप्ताह मंत्रिमंडल विस्तार की हलचलें शुरू हुई तो मंत्री पद के कई दावेदार सक्रिय हो गए।
तमाम नामों को लेकर कयासबाजी का दौर शुरू हो गया। मंत्रिपद के दावेदार लखनऊ पहुंचकर अपनी गोटें बिठाने में जुट गए।
पूर्वांचल से अल्पसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले एक विधायक तो पूरी तरह आश्वस्त थे लेकिन जब नाम सामने आए तो उनकी सिट्टी पिट्टी गुम हो गई। अब बेचारे करते क्या? समर्थकों को उकसाकर पार्टी नेतृत्व पर दबाव बनाने में जुटे हैं।
उनकी तरह कई अन्य नेता भी है जो जख्म सहलाने के अलावा कुछ कर नहीं सकते। ये नेता खुलकर तो मुखालफत करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं लेकिन पूर्वांचल के नेता के समर्थन में चल रहे आंदोलन से राहत जरूर महसूस कर रहे हैं।
एक दावेदार का तो यहां तक कहना है कि मंत्री नहीं बन पाए तो क्या हुआ, दो-तीन दिन तक मीडिया में नाम की चर्चा तो रही। यही बड़ी बात है। वैसे ही कौन पूछता था?
हो सकता है कि इस चर्चा का फायदा अगली बार मिल ही जाए। उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए, तीसरे नहीं तो चौथे विस्तार में सही।