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बातचीत: सपा में शामिल हुए रामअचल राजभर बोले- भाजपा के साथ दलित वोटों का सौदा कर सकती हैं मायावती

Thu, 06 Jan 2022 11:30 AM IST
ishwar ashish अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ

सार

बसपा छोड़कर सपा में आए रामअचल राजभर का कहना है कि मायावती भाजपा के साथ दलित वोटों का सौदा कर सकती हैं। अब बसपा खत्म हो चुकी है।
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रामअचल राजभर - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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सपा में आए बसपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रामअचल राजभर कहते हैं, अकबरपुर से जनता ने जिताया है, तो चुनाव यहीं से लड़ना चाहता हूं, इसमें कोई शंका नहीं है।

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सवाल: अंबेडकरनगर में समीकरण बदल गए हैं, कैसे चुनाव लड़ेंगे?
जवाब:
मेरे सपा में आने से अंबेडकरनगर ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश व पूर्वांचल में समीकरण बदला है। 7 नवंबर को रामअचल राजभर संघर्ष मोर्चा के तत्वाधान में जनादेश महारैली भानुमती पीजी स्मारक कॉलेज में की गई, जिसमें राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव मौजूद रहे। इसमें सबकुछ स्पष्ट हो गया। पांचवीं बार अकबरपुर से जनता ने जिताया है, तो चुनाव यहीं से लड़ना चाहता हूं। इसमें कोई शंका नहीं है। पिछली बार हमसे चुनाव लड़कर हारे पूर्व मंत्री राममूर्ति वर्मा का समायोजन राष्ट्रीय अध्यक्ष को करना है, वे जो निर्णय लेंगे हम उसका पालन करेंगे। हम अनुशासित व्यक्ति हैं। हमने कोई दूसरा विधानसभा क्षेत्र नहीं ढूंढा है। 1991 में हारने के बाद लगातार जीता। 2012 में मेरे बेटे संजय यादव को भी 67 हजार वोट मिला, तब एक बार राममूर्ति जीते थे। उसके बाद 2017 में उन्हें हराकर मैं जीता। कैसे इस सीट को छोड़ दूंगा। हमने अकबरपुर छोड़कर कोई और सीट कभी नहीं मांगी है।

सवाल: बसपा से निकाले जाने को किस रूप में देखते हैं?
जवाब:
मुझे निकालने से बसपा के प्रति लोगों में अविश्वास बढ़ा है। प्रदेश में बड़े पैमाने पर लोग जौनपुर, वाराणसी, चंदौली, गाजीपुर, आजमगढ़, देवरिया, मऊ, बलिया, सुल्तानपुर, अयोध्या, संत कबीरनगर, बहराइच तमाम जिलों के लोगों ने इस्तीफा दिया।  मेरे निकाले जाने के बाद पहली बार नजारा दिखा। सर्वसमाज के साथ राजभर समाज ने बसपा छोड़ दी। इसके अलावा महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, दिल्ली, पश्चिम बंगाल के लोगों ने भी हमारी 38 साल की सेवा का हश्र देख इस्तीफा दिया। पार्टी को खड़ा करने में मेरी पूरी जवानी बीत गई। कुल मिलाकर कहें तो कांशीराम का मिशन गायब हो गया है। बसपा अब खत्म हो रही है। लोग सपा के साथ खुलकर आ गए हैं। पश्चिम में जयंत समेत अन्य छोटे-छोटे दलों के गठबंधन से इस बार ऐतिहासिक जीत के साथ सपा की सरकार बनेगी।
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सवाल: बसपा का कितना प्रभाव होगा?
जवाब:
हम तो अब बसपा छोड़ चुके हैं, लेकिन मायावती की गतिविधियों से आम धारणा है कि वह भाजपा के साथ दलित वोटों का सौदा कर सकती हैं। मुझे उनका भाजपा में झुकाव महसूस होता है।

सवाल: आपके आने से क्या पुराने सपा के नेता दलबदल कर सकते हैं
जवाब:
अब देखिए भैया मैं क्या बोलूं, मैंने राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से कहा था कि हम आ रहे हैं तो केवल अपने लिए नहीं, बल्कि एक बड़े तबके राजभर समाज व सर्वसमाज के साथ आ रहे हैं। इसलिए कुछ टिकटों की बात हुई है। मतलब हमें सात टिकट दिया जाए, जिससे कि हम अपने लोगों को समायोजित कर सकें। अखिलेश पर विश्वास होगा तो टिकट के लिए सपा नेताओं को दूसरी पार्टी में नहीं जाना चाहिए। बसपा-भाजपा में जगह खाली तो हो गई है, जो लड़वैया हैं, वे तो मानेंगे नहीं। हम तो मरते दम तक अब अखिलेश के साथ रहेंगे। मेरा तो पहले संकल्प था कि नीले कफन में मेरी लाश जाएगी, लेकिन अब मायावती बुलाएं तो भी कभी नहीं जाऊंगा। मायावती को पीएम तो नहीं बना सका, लेकिन रातों दिन काम करके अखिलेश को एक दिन पीएम जरूर बनाऊंगा।

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अकबरपुर से तो मैं ही लड़ूंगा चुनाव : राममूर्ति

2012 में अकबरपुर से पहला चुनाव जीतकर कैबिनेट मंत्री रहे राममूर्ति वर्मा कहते हैं, यहां से मैं ही चुनाव लड़ूंगा। रामअचल राजभर बसपा से निकाल दिए गए थे, तब आए। उनकी ज्वॉइनिंग के समय तय हुआ था कि जलालपुर या गाजीपुर से चुनाव लड़ेंगे। अकबरपुर से लड़ने की बात होती तो उन्हें सपा में शामिल ही नहीं कराया जाता। लालजी वर्मा को भी कटेहरी से लड़ने की शर्त पर नहीं शामिल कराया गया। मतभेद से पार्टी का नुकसान ही होगा। इसका फायदा भाजपा को मिलेगा। सपा से जो जहां से लड़ा है, अभी वही दावेदार है। इधर-उधर होने से परिस्थितियां विद्रोह की ही बनेंगी। राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के आदेश का पालन सभी करेंगे।
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