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बाबरी विध्वंस: 22 साल बाद भी नहीं बदली सियासत

Sat, 06 Dec 2014 07:49 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
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धीरे-धीरे 22 साल हो गए। बहुत कुछ बदल गया। अयोध्या स्थित विवादित स्थल पर उच्च न्यायालय का फैसला भी आ गया। केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार भी आ गई। मुस्लिम पक्ष के प्रमुख पैरोकार 93 वर्षीय हाशिम अंसारी के बोल भी बदल गए।
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जो हाशिम मरते दम तक बाबरी मस्जिद के लिए पैरवी करने की बात करते नहीं थकते थे, वे अब जीवन के बचे दिनों में ही इस समस्या का समाधान देखना चाहते हैं। पर, नहीं बदली तो सिर्फ सियासत।

अयोध्या वाले भले ही कह रहे हों, ‘बस बहुत हुआ! अब इस पर विराम लगना चाहिए।’ पर, बाहर वाले बोल रहे हैं कि हाशिम कौन होते हैं, मुकदमे की पैरवी न करने और रामलला को तिरपाल के बजाय राजमहल में बैठाने की बात करने वाले।
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अयोध्या चाहती कि विवाद खत्म हो। बाहरी इसे बरकरार रखने की कोशिश में हैं। जिससे एक बार इस बात की चर्चा फिर शुरू हो गई है कि अब मंदिर का क्या होगा।

मोदी ने दिखाया कायम है राम ‌मंदिर एजेंडा

बात पहले भगवा खेमे की। लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी ने कभी सीधे तौर पर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण की बात नहीं की। पर, संकेतों में इस बारे में संदेश देने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी। सियासत को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश परवान चढ़ाने में भी वह पीछे नहीं रहे।

चुनावी सभा के लिए वह अयोध्या तो नहीं आए। आडवाणी की तरह श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर जाकर माथा भी नहीं टेका। पर, फैजाबाद की सभा में उन्होंने अपने मंच पर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के मॉडल को रखकर यह संदेश देने में  कोई कसर नहीं छोड़ी कि जुबान पर न सही लेकिन दिल में कहीं न कहीं यह एजेंडा जरूर है।

इस चुप्पी में है छिपी आवाज: राजनीतिक समीक्षकों की मानें तो केंद्रीय सियासत में मोदी के शक्तिशाली उदय के साथ राजनीति के मायने बदले हैं। भले ही मोदी राम जन्मभूमि मंदिर पर कुछ न बोल रहे हों लेकिन उनके विश्वासपात्र अमित शाह न सिर्फ बतौर प्रभारी अयोध्या जाकर श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण की प्रतिबद्धता जता चुके हैं।

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी सरकार बनने के बाद कई बार इस मुद्दे को कुछ उसी तरह करोड़ों लोगों की आस्था का विषय बता चुके हैं। बतौर प्रधानमंत्री मोदी का कल्याण सिंह को राज्यपाल बनाना, उमाभारती व साध्वी निरंजन ज्योति जैसे भगवा चेहरों की केंद्रीय मंत्रिमंडल में मौजूदगी भी यह बताने के लिए पर्याप्त है कि जन्मभूमि मुद्दा उनके लिए अछूत नहीं है।

इन बातों से मिलते हैं प्रमाण

केंद्र सरकार की चुप्पी का कोई कुछ अर्थ निकाले, पर संघ को भरोसा है कि मोदी मंदिर मुद्दे का समाधान निकाल लेंगे। पिछले दिनों लखनऊ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक के केंद्रीय कार्यकारी मंडल की बैठक के दौरान अनुच्छेद 370 व समान नागरिक संहिता पर पूछे गए सवालों पर जिस तरह 2019 तक इंतजार करने की बात कही गई उससे साफ है कि संघ को इसका पूरा भरोसा है।

वरिष्ठ पत्रकार व समीक्षक रतनमणि लाल कहते है कि मंदिर मुद्दे पर मोदी की चुप्पी का यह अर्थ निकालना गलत होगा कि वह अटल बिहारी वाजपेयी की राह पर चलेंगे। सरकार चलाने पर ज्यादा और भगवा एजेंडे पर कम ध्यान देंगे। वह मंदिर मुद्दे पर भी कुछ न कुछ करेंगे जरूर। लेकिन कब, इसका सवाल भविष्य में ही मिलेगा।

बिन बोले सांप्रदायिक समीकरण भी साधे: मंदिर मुद्दे के अलावा भगवा टोली के हिंदुत्व को धार देने के एजेंडे की कसौटी पर मोदी को कसें तो भी उनके बारे में संकेतों से समीकरण साधने की कहावत सही साबित होती है।

चुनाव सभाओं के मंच पर उन्होंने नारा तो ‘सबका साथ-सबका विकास’ का लगाया, पर  ‘गुलाबी क्रांति’ के बहाने केंद्र और यूपी सरकार पर जिस तरह हमला किया था, उसके पीछे कहीं न कहीं कोशिश हिंदुत्व को धार देने की ही रही। समझा जा सकता है कि मोदी की इन बातों के पीछे मकसद क्या था।

दूसरा पक्ष भी पीछे नहीं, कायम रखेंगे यह मुद्दा

हाशिम भले ही विवाद से पीछे हट रहे हों लेकिन वे लोग अब भी पीछे हटने को तैयार नहीं जिनकी आदत में ही सियासत है। उनकी गाडियां हाशिम के घर पहुंच रही हैं, जिन्हें इस मुद्दे के मर जाने से अपनी सियासत भी खत्म हो जाने का खतरा दिख रहा है।

खुद को सपा का दूत बताने वाले पूर्व मंत्री पवन पांडेय अपने मामा जयशंकर पांडेय के साथ हाशिम से सिर्फ यही मनुहार करते दिख रहे हैं, ‘चाचा! मोदी का नाम न लिया करो।’ अन्य कई लोग भी मीडिया में यह बयान चलवाने व छपवाने को बेकरार हैं कि अकेले हाशिम के पैरोकारी न करने से मुकदमे पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

दुनिया भले ही अब तक मुसलमानों की तरफ से प्रमुख पैरोकार के रूप में हाशिम को ही जानती हो लेकिन इधर तीन दिनों से तमाम संगठन व चेहरे इस दावे के साथ सामने आ गए हैं कि वे भी बाबरी मस्जिद के पैरोकार हैं। हाशिम मान भी जाएं तो वे नहीं मानने वाले।
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फिर भी आसान नहीं होगी राम मंदिर की राह

जाहिर है कि श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का समाधान बहुत आसानी से नहीं निकल आएगा। भले ही हाशिम अंसारी ने सकारात्मक रुख अपनाते हुए यह कहा हो, रामलला को अब तिरपाल में नहीं रहना चाहिए। रामलला को अब आजाद होना चाहिए।’ पर, इससे यह अर्थ निकाल लेना जल्दबाजी होगा कि मंदिर की राह बहुत आसान हो गई है।

मो. आजम खां सहित कई अन्य लोगों ने जिस तरह हाशिम की बात का विरोध किया है, उससे अभी सिर्फ यही कहा जा सकता है कि यह मुद्दा अभी कुछ दिन और सियासत के केंद्र में रहेगा।

भले ही मोदी मूक रहकर मकसद साधें या फिर आजम, जफरयाब जीलानी, मुलायम सिंह यादव, कांग्रेस व अन्य पार्टियों के लोग बोलकर। पर, जब-जब 6 दिसंबर आएगा तो यह मुद्दा किसी न किसी रूप में चर्चा में आएगा। सियासत को गरमाएगा।

अप्रासंगिक होती जा रही विहिप : भगवा टोली के ताकतवर होने और भगवा चेहरे की केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार होने के बावजूद विहिप अपनी जमीन को मजबूत नहीं बना पा रही है।

पहले के आयोजनों को छोड़ भी दें तो पिछले दिनों अयोध्या से जनकपुर जाने वाली रामबारात की विदाई के समय भरपूर कोशिश के बावजूद जिस तरह सवा सौ लोग ही जुट पाए, उससे साफ है कि विहिप लोगों का भरोसा हासिल करने में लगातार नाकाम साबित हो रही है। यह बदलाव बताता है कि लोग श्रीराम जन्मभूमि मंदिर तो चाहते हैं लेकिन विहिप के रास्ते पर नहीं।
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