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अटल के गढ़ से बेचैन होकर दिल्ली लौट आए राजनाथ सिंह

Mon, 31 Mar 2014 12:03 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, लखनऊ
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अटल की विरासत के उत्तराधिकारी बनने की कोशिश कर रहे राजनाथ सिंह के पैर लखनऊ में तीन दिनी प्रवास के बाद कंपकंपा गए होंगे।
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उनकी समझ में आ गया होगा कि रास्ता काफी टेढ़ा-मेढ़ा है।

तभी तो दिल्ली लौटने से पहले उन्होंने सभी महत्वपूर्ण मोर्चों पर अपने विश्वसनीय लोगों की तैनाती की।

अपने लोगों को कई जिम्मेदारियां सौंपीं। साथ ही ब्राह्मणों की नाराजगी भांपते हुए संघ से बातचीत करके पूर्व वरिष्ठ संगठन मंत्री जयप्रकाश चतुर्वेदी को समन्वयक बनवाया।

कायस्थ वोटों को साधने के उद्देश्य से डॉ. एससी राय जैसे पुराने नेताओं से मिलकर सियासी सामाजिक समीकरणों को संतुलित करने की कोशिश की।

चुनाव की जिम्मेदारी दूसरे पर डालने के बजाय पत्नी सावित्री सिंह व पुत्र पंकज सिंह को सौंपकर दिल्ली लौटे।

लखनऊ में रहने का किया वादा

स्थानीय सांसद लालजी टंडन और महापौर डॉ. दिनेश शर्मा के आश्वासन के बावजूद यह घोषणा भी की कि वह कोशिश करेंगे कि प्रतिदिन शाम को लखनऊ में रहें।

कार्यकर्ताओं को भी यह भरोसा दिलाने में भी उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी कि भले ही राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाते अभी लखनऊ कम आ पाते हों लेकिन सांसद बन गए तो राजधानी के एक-एक कार्यकर्ता से वह सीधा संवाद रखेंगे।

चुनाव बाद एक-एक कार्यकर्ता के घर जाकर उसे अपने हाथ से माला पहनाकर सम्मानित करेंगे।

संकेत से लेकर सबक तक

दरअसल, तीन दिनों के लखनऊ प्रवास के दौरान राजधानी का काफी सच उनके सामने आ गया।

राजनाथ के लखनऊ पहुंचने से लेकर यहां से रवाना होने तक इस बार वैसी भीड़ नहीं दिखी जैसी इससे पहले दिखती थी। उनके आवास पर भी पहले जैसा माहौल नहीं रहा।

निरालानगर के माधव सभागार में हुए कार्यकर्ता सम्मेलन में कानपुर, वाराणसी, बाराबंकी, उन्नाव, रायबरेली से कार्यकर्ताओं की कम उपस्थिति से भी भी उन्हें चिंता हुई ही होगी।

रही-सही कसर पूरी हो गई उनके दिल्ली रवाना होने से ठीक पहले आवास पर पार्टी के प्रमुख कार्यकर्ताओं की बैठक में, जहां मंच पर मौजूद कुछ नेताओं को लेकर कार्यकर्ताओं का गुस्सा मुखर हो गया।

सिंह के लिए यह पहला मौका होगा, जब लखनऊ के कार्यकर्ता इस रूप में उनके सामने आए हों।

भले ही राजनाथ ने इस पर कोई सार्वजनिक टिप्पणी न की हो लेकिन इतना तो उनकी समझ में आ ही गया होगा कि लखनऊ का मूड उतना अच्छा है नहीं, जैसा समझकर वह आए हैं।
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अब होगा ऑपरेशन

राजनाथ समझ चुके हैं कि लखनऊ की लड़ाई आसान नहीं है।

उन्हें चुनाव न सिर्फ भरोसेमंद लोगों की देखरेख में लड़ना होगा बल्कि कार्यकर्ताओं को जोड़ने के लिए उनसे सीधे संवाद करना होगा।

स्वाभाविक है कि इसके लिए राजनाथ कुछ ऑपरेशन भी करेंगे।

इसका तौर-तरीका तो आगे सामने आएगा, पर लखनऊ की पटकथा पढ़ने के बाद राजनाथ यह समझ चुके होंगे कि प्रतिष्ठा बढ़ाने के चक्कर में वे अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा बैठे हैं।
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