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गुलाबो-सिताबो करने लगीं बैले, पर नहीं मिले कद्रदान

Fri, 21 Mar 2014 01:10 PM IST
नीरज अम्बुज/अमर उजाला, लखनऊ
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परंपरागत कहानियों से निकलकर कठपुतलियां नए मुद्दों से जुड़ रही हैं। यहां तक की बैले और रॉक डांस तक करने लगी हैं, बावजूद इसके उनके कद्रदानों की संख्या लगातार गिरती जा रही है।
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सराहनीय है उन कलाकारों का प्रयास, जिन्होंने घटते प्रशंसकों के बावजूद इस कला को मरने नहीं दिया है।

अपने निजी प्रयासों से वह इस कला को जीवित बनाए हुए हैं। विश्व कठपुतली दिवस पर पेश है पुतुल कलाकारों से बातचीत पर आधारित रिपोर्ट...

मेहनताना बढ़े तो जुड़ें कलाकार

पिछले 25 वर्षों से कठपुतलियों को एक नई ऊंचाईयों तक पहुंचाने में लगे मयूर पपेट थियेटर के अध्यक्ष व कठपुतली कलाकार प्रदीप त्रिपाठी ‘टीना’, ‘चिड़िया की कहानी’, ‘नटखट मुर्गा’, ‘लवकुश’, ‘कृष्णा’, ‘अवंतीबाई’, ‘रंगीला’, ‘काबुलीवाला’ सहित कठपुतलियों के कई शो कर चुके हैं।

‘गुलाबो-सिताबो’ के लिए उन्हें मानव विकास संसाधन मंत्रालय से फेलोशिप भी मिल चुकी है। गुलाबो-सिताबो का विदेश में पहला मंचन करने का श्रेय प्रदीप को ही जाता है।

वह बताते हैं कि विभिन्न सरकारी विभागों द्वारा कठपुतली के जरिए योजनाओं का प्रचार-प्रसार करने के एवज में संस्थाओं को महज हजार रुपये मिलते हैं।

जबकि एक शो में कई कलाकार शामिल होते हैं। इस लिहाज से उन्हें न्यूनतम पारिश्रमिक भी नहीं मिल पाता।

शिद्दत से सेवा में लगा है पूरा परिवार

15 साल से कठपुतलियों की सेवा करते आ रहे हैं कलाकार मेराज आलम। इनकी फेहरिस्त में भी कई चर्चित व नामचीन पपेट शो हैं।

वे ‘जूता अविष्कार’, ‘आजादी पोलियो से’, ‘दो कदम दो बूंद’, ‘खड़कू सिंह और नन्हूं नाई’, ‘एलर्जी’ और ‘आदाब अर्ज’ जैसे शो कर चुके हैं। इतना ही नहीं उनकी पत्नी अजरा मेराज, बेटा तनय मेराज व बेटी तान्या मेराज भी कठपुतली के बेहतरीन कलाकार हैं।

पूरा परिवार कठपुतली को आम लोगों तक पहुंचाने के अभियान में सशक्त भूमिका निभा रहा है। मेराज हंसते हुए कहते हैं कि गुलाबो-सिताबो तो बदलते वक्त में बैले डांस तक करने लगी हैं, लेकिन उन्हें कद्रदान नहीं मिल रहे हैं।

वह बताते हैं कि कलाकारों के व्यक्तिगत प्रयासों के अलावा सरकार की भी जिम्मेदारी है कि लोगों में जागरूकता फैलाने का काम करे।

कहते हैं कि बदलते जमाने के साथ पपेट ने भी खुद को बदला है। ‘पहेली’ जैसी फिल्में तक कठपुतली पर केंद्रित हैं।

परवान चढ़ने से पहले ही खत्म हो गई योजना

पुतुल को प्रोत्साहित करने केलिए वर्ष 2004 में संगीत नाटक अकादमी की ओर से योजना बनाई गई। मैनेजर इन परफॉर्मिंग आर्ट्स केपद पर नियुक्त सुभाष चंद्र मिश्र को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई।

वह बताते हैं कि एसएनए में बनाई गई योजना चार चरणों में पूरी होनी थी। इसमें वर्कशॉप, स्कूलों में बच्चों को प्रशिक्षित करने, प्रतियोगिताएं कराने व राष्ट्रीय स्तर का महोत्सव आयोजित करना शामिल था।

महज कुछ समय बाद ही योजना का दम फूलने लगा। अधिकारियों की लापरवाही के चलते योजना बंद कर दी गई। करीब दो लाख रुपये की कठपुतलियां खरीदी गईं थीं।

सूत्रों की मानें तो लम्बे अर्से से बक्सों में बंद इन कठपुतलियों को हाल ही में जला दिया गया है।

वह बताते हैं कि एसएनए दिल्ली में पपेट को प्रोत्साहित करने के लिए एक करोड़ रुपये का बजट है, लेकिन यहां सरकार पूछ तक नहीं रही। ऐसे में कठपुतलियों का विकास कैसे होगा।
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अवध और कठपुतली कला

अवध में कठपुतलियों का इतिहास नवाबों के शासनकाल से है। नवाब वाजिद अली शाह के शासनकाल में हिन्दी-उर्दू मिश्रित गुलाबो-सिताबो पपेट शो की शुरुआत हुई।

आगे चलकर गुलाबो-सिताबो कठपुतली कला का पर्याय हो गईं। फिर 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में कठपुतलियों का इस्तेमाल लोगों में देशप्रेम जगाने के लिए होने लगा।

आजादी के बाद 1963 में लखनऊ के लिटरेसी हाउस में अमेरिकी महिला वेल्दी फिशर ने कठपुतलियों का विंग शुरू करवाया।

जहां से प्रशिक्षित होकर निकले कलाकार सूचना विभाग से जुड़े और शो करते रहे।

फिलहाल कठपुतली कलाकारों की यूनियन ‘यूनिमा’ केअध्यक्ष दादी पदमजी प्रतिवर्ष अंतरराष्ट्रीय पपेट फेस्टिवल का आयोजन करवाते हैं। इसमें देश-विदेश के कलाकार शामिल होते हैं।
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