आम आदमी की दाल पर महंगाई की मार के बाद भले ही इससे निजात दिलाने के दावे किए जा रहे हों लेकिन जो हालात हैं उससे इसकी उम्मीद कम ही बंधती है। दलहनी फसलों के उत्पादन और डिमांड के बीच लंबी खाई इसकी वजह है।
जानकारों का कहना है कि अरहर ही नहीं अन्य दालों के उत्पादन में भी कमी के कारण यह संकट है। आलम यह कि सभी दालों को मिला दिया जाए तो सूबे में जरूरत जहां 36 लाख टन की है तो उत्पादन कुल 12 लाख टन ही था। ऐसे हालात में केंद्र सरकार के प्रति महीने महज 250 टन अरहर दाल देने की हामी नाकाफी साबित होगी।
मांगा 21 हजार टन, मिली सिर्फ 250 टन : प्रदेश सरकार ने सूबे के गरीबी रेखा से नीचे वाले 1.06 करोड़ परिवारों के लिए केंद्र से प्रतिमाह 21 हजार टन अरहर की दाल मांगकर इस संकट से निजात पाने की कार्ययोजना बनाई थी। पर, केंद्र सरकार ने सिर्फ एक राज्य को इतनी दाल देने में असमर्थता जता दी है।
प्रमुख सचिव खाद्य-रसद सुधीर गर्ग के अनुसार, केंद्र ने 250 टन अरहर की दाल उपलब्ध कराई है। कर्मचारी कल्याण निगम के अधिशासी निदेशक एके उपाध्याय के अनुसार, कर्मचारी कल्याण निगम के अनुसार 2 नवंबर से लखनऊ में और एक सप्ताह के अंदर पूरे प्रदेश में निगम की तरफ से दाल की बिक्री शुरू करा दी जाएगी। यह दाल 120 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से लोगों को उपलब्ध होगी।
पर, राहत की उम्मीद नहीं
सरकार भले ही 250 टन दाल के सहारे लोगों को राहत मिल जाने का सपना देख रही हो लेकिन इसका सच में तब्दील होना बहुत मुश्किल है। केंद्र से मिलने वाली 250 टन अरहर दाल का मतलब 2500 क्विंटल होता है।
इतनी मात्रा को अगर प्रदेश के 75 जिलों से ही भाग दे दें तो एक जिले के हिस्से में 50 क्विंटल दाल भी नहीं आएगी। स्थिति का आकलन किया जा सकता है।
यह हैं दुश्वारियां : विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदेश की लगभग 20 करोड़ की आबादी के लिए सालाना 36 लाख टन दाल की जरूरत है। इसमें लगभग 50 प्रतिशत लोगों की डिमांड अरहर दाल की होती है।
इस लिहाज से प्रदेश के लोगों को प्रतिवर्ष लगभग 18 लाख टन अरहर दाल की जरूरत है। पर, सूबे में अरहर की दाल का उत्पादन घटते-घटते 1.74 लाख टन ही रह गया है। बाकी की पूर्ति दूसरे राज्यों से ही होती है।
पिछले तीन साल में आधा हो गया उत्पादन
कृषि विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि पिछले तीन सालों में सूबे में अरहर की दाल का उत्पादन घटकर आधा रह गया है। वर्ष 2011-12 में प्रदेश में अरहर की दाल की खेती 3.21 लाख हेक्टयर में की गई थी।
इसमें उत्पादन लगभग 3.31 लाख टन अर्थात 11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन हुआ था। वर्ष 2013-14 में किसानों ने सिर्फ 2.88 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में अरहर बोई। इससे 2.62 लाख टन अर्थात 9.81 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन हुआ। पिछले वर्ष 2014-15 में अरहर की खेती की तो गई वर्ष 13-14 के लगभग बराबर 2.87 हेक्टेयर में। पर, उत्पादन काफी घट गया। सिर्फ 1.74 लाख टन दाल का ही उत्पादन हुआ।
सभी दालों पर संकट : कृषि प्रशिक्षण संस्थान रहमान खेड़ा के निदेशक मुकेश गौतम के अनुसार, प्रदेश में अरहर, उड़द, मूंग, चना, मटर व मसूर सहित सभी दलहनी फसलों की खेती लगभग 24-25 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में की जाती है।
इसमें आधी खेती सिर्फ बुंदेलखंड में होती है। गौतम जो आंकड़े देते हैं, उन पर नजर डालें तो सिर्फ अरहर ही नहीं बल्कि बाकी दालों पर भी संकट की छाया दिखाई दे रही है।
आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में वर्ष 2011-12 में 24 लाख टन दाल का उत्पादन होता था। वर्ष 2012-13 में घटकर 15 लाख टन रह गया। यह 13-14 में सिर्फ 12 लाख टन ही रह गया। प्रदेश की कुल 36 लाख टन जरूरत में अगर सभी प्रकार की दालों के12 लाख टन उत्पादन को घटा दें तो भी सूबे में 14 लाख टन दाल की कमी है।