जब काम का वक्त था तब कर्मचारी संगठनों ने कच्ची नौकरी को पक्की कराने और सुविधाएं बढ़ाने का दबाव बनाया। अब चुनाव नजदीक है तो ‘अभी नहीं-तो कभी नहीं’ वाले अंदाज में उन्होंने अपने नकद फायदे से जुड़ी मांगें मनवाने का दबाव बढ़ा दिया है।
ऐसे सेवा संवर्ग वाले लोग सरकार से कुछ न कुछ पाने में सफल रहे हैं जिनकी तादाद ज्यादा है और राजधानी की सड़कों पर दम दिखा पाए हैं। फायदा वे भी पाने में सफल रहे हैं जो चुनावी समीकरण के लिहाज से संदेश देते हैं।
कर्मचारी संगठनों ने अखिलेश सरकार पर दबाव बनाकर कई अहम फैसले कराने में कामयाबी हासिल की। सबसे महत्वपूर्ण करीब 10 हजार संविदा, दैनिक व कार्यप्रभारित कर्मचारियों की नौकरी पक्की किया जाना रहा।
जून 2009 के बाद से ऐसे कर्मियों को नियमित नहीं किया जा रहा था। धरना-प्रदर्शन व आंदोलन हुए। सपा सरकार ने इस ओर कदम बढ़ाया और दिसंबर 2001 तक नियुक्त ऐसे कर्मियों की नौकरी पक्की करने का फैसला किया।
कई बार धरना-प्रदर्शन और चेतावनी के बाद राज्य कर्मियों का 20 फीसदी आवास किराया भत्ता भी बढ़ा। सरकार ने कर्मचारियों को कैशलेस इलाज की सुविधा भी दे दी है।
विभिन्न सेवा संवर्गों की तमाम समस्याएं सुलझाई गई हैं, फिर भी कई संगठनों की बात अधूरी रह गई। इधर, चुनाव नजदीक देख अनेक कर्मचारी संगठनों ने लखनऊ में डेरा डाल दिया है।
ग्राम रोजगार सेवक, आंगनबाड़ी, पंचायतीराज सफाई कर्मचारी, होमगार्ड और रसोइयों के आंदोलन का खामियाजा राजधानी के लोग भुगत चुके हैं।
पर, संख्या और ताकत की बदौलत इनकी आवाज मुख्य सचिव राहुल भटनागर से लेकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तक को सुननी पड़ी है। ग्राम रोजगार सेवक, लेखपाल, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं से सीएम स्वयं मिले।
उन्होंने कुछ मांगों पर आश्वासन दिया तो कई मामलों में वेतन या मानदेय में तत्काल बढ़ोतरी का एलान कर आंदोलन खत्म कराने की पहल की।