उर्दू के बेहतरीन उपन्यासों में शुमार है मिर्जा हादी रुस्वा की किताब
‘उमराव जान अदा’, जो तकरीबन सौ वर्ष पुरानी है।
इतना ही नहीं यूनेस्को ने
उर्दू की जिन 13 किताबों का तर्जुमा (अनुवाद) किया है, उनमें ये किताब भी
शामिल हैं। उपन्यासकार की संजीदगी का अंदाजा इस बात से भी लगता है कि वे कई
जुबानों में माहिर थे।
यह कहना है शारिब रुदौलवी का। उन्होंने कहा कि हादी
उमराव जान को लोगों के जेहन में उतार गए। वे ‘अमर उजाला’ व लखनऊ सोसाइटी
की ओर से शुक्रवार को जयशंकर सभागार में मिर्जा हादी रुस्वा की याद में
आयोजित ‘शाम-ए-अदब’ में बोल रहे थे।
मिर्जा
शफीक हुसैन ने हादी के साथ उमराव जान पर फिल्म बनाने वाले निर्देशक
मुजफ्फर अली के व्यक्तित्व पर भी रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि मुजफ्फर ने
गहन अनुसंधान के बाद फिल्म बनाई, जिसमें लखनवी तहजीब की झलक दिखती है।
आयशा
सिद्दीकी ने कहा कि हादी के उपन्यास की जुबान में शीरीनियत घुली है, जिसे
रुस्वा ने अल्फाज-दर-अल्फाज तैयार किया है।
वसीम बेगम ने बताया कि उमराव
जान न महज एक किरदार है, बल्कि लखनवी तहजीब का आईना भी है, जिसमें उस
जिंदगी की परछाईं दिखती है।
इसमें संगीत, नृत्य और अदब मिला है। हबीब
मूसवी ने रुस्वा के घर के बारे में बताया कि गोलागंज में रहकर क्रिश्चियन
कॉलेज में पढ़ाई करते थे, लेकिन अब उनकी कोई निशानी शेष नहीं रही।
राजीव
प्रकाश साहिर ने उनके साहित्यिक अदब को रोशन किया। इसके अलावा अदाकारा
फर्रुख जफर, मिर्जा शफीक हुसैन ने भी अपने वक्तव्य प्रस्तुत किए।
इस मौके
पर लखनऊ सोसाइटी के आरजू ने सभी वक्ताओं को स्मृति चिह्न भेंट
किए। शाम-ए-अदब का अगला कारवां नवम्बर में साहित्यकार ‘अली सरदार जाफरी’ की
शख्सियत है।