सूबे में पैदा होने वाले दस में से चार प्रीमेच्योर बेबी रेटिनोपैथी ऑफ प्रीमेच्योरिटी (आरओपी) बीमारी के शिकार हो रहे हैं। इससे हमेशा के लिए उनकी आंखों की रोशनी चली जाती है।
अगर जन्म के 30 दिन के भीतर इन शिशुओं की आंखों की जांच हो जाए, तो उन्हें अंधा होने से बचाया जा सकता है।
लेकिन स्वास्थ्य विभाग के पास इस बीमारी की स्क्रीनिंग की कोई सुविधा नहीं है। इतना ही नहीं, विभाग के पास न तो इसके विशेषज्ञ हैं और न ही कोई संसाधन, जिससे आरओपी की पहचान कर उसका इलाज कर सकें।
हालांकि राजधानी के एक निजी अस्पताल में इस बीमारी का इलाज किया जा रहा है। नेत्र रोग व रेटिना विशेषज्ञ डॉ. समर्थ अग्रवाल के अनुसार समय से पूर्व जन्म लेने वाले शिशुओं में से 47 फीसदी को आरओपी हो सकता है।
लिहाजा जरूरी है कि हर प्रीमेच्योर बेबी की आंखों की समय पर जांच हो ताकि उसे अंधा होने से बचाया जा सके। यूं तो आरओपी बीमारी की स्क्रीनिंग को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) में शामिल किया गया है।
कहीं नहीं हो रही आरओपी की जांच
इसके बावजूद आरओपी की जांच के लिए न किसी सरकारी अस्पताल और न ही किसी निजी अस्पताल को तैयार किया जा सका है। पूरे देश में सिर्फ कर्नाटक के नारायण नेत्रालय को अभी तक आरबीएसके से जोड़ा गया है। यहां के चिकित्सक शिशुओं की रेटिना की जांच करते हैं।
इन सभी बच्चों को आरओपी का खतरा। 34 सप्ताह से पहले जन्म लेने वाले व जुड़वां बच्चों को, जन्म के वक्त जिसका वजन 1750 ग्राम से कम हो, पैदा होते ही बीमार हो रहने वाले शिशुओं को, जन्म के बाद से लंबे समय तक कृत्रिम ऑक्सीजन पर रहने वाले शिशुओं को, और मानक से अधिक मात्रा में ऑक्सीजन देने से (दरअसल शिशु को 95 फीसदी ऑक्सीजन दी जानी चाहिए, जबकि सामान्यत: उन्हें भी 100 फीसदी ऑक्सीजन दे जाती है)
इसलिए चली जाती है आंखों की रोशनी
रेटिना स्पेशलिस्ट डॉ. समर्थ अग्रवाल ने बताया कि आरओपी के कारण प्रीमेच्योर और कमजोर शिशुओं में रेटिना की रक्तनलिकाएं सामान्य रूप से विकसित नहीं हो पाती हैं।
ऐसे शिशुओं का इलाज तभी संभव है जब उनकी रेटिना की जांच 30 दिन के भीतर हो जाए। जैसे-जैसे समय बीतता है, आंखों की रोशनी जाने की आशंका बढ़ती जाती है और एक बार रोशनी जाने पर फिर इलाज संभव नहीं है।
आरबीएसके के जीएम डॉ. अरुणा नारायण कहते हैं कि राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम में फिलहाल आरओपी से पीड़ित शिशुओं की स्क्रीनिंग की व्यवस्था नहीं है। इसके लिए डॉक्टरों को प्रशिक्षित करना होगा, जिससे वे प्रीमेच्योर बेबी को नेत्र रोग विशेषज्ञ व रेटिना स्पेशलिस्ट के पास रेफर कर सकें। इसके लिए तैयारी की जा रही है।