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दिल खोलकर रो लीजिए, मत छिपाइए अपनों को खोने का गम

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रोली खन्ना
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राहत है कि कोरोना के केस घट रहे हैं और मरीजों के ठीक होने की दर भी ज्यादा है। इसके बावजूद मौतों का बढ़ता आंकड़ा डरा रहा है।
ऐसे में कल तक खुद को बेहद मजबूत समझने वाले भी इन दिनों खुद को कहीं न कहीं कमजोर पा रहे हैं। हो भी क्यों न, रोजाना किसी न किसी के जाने की खबर ने सबको तोड़कर रख दिया है।
वहीं, जिन्होंने अपनों को खोया, वे इलाज करवाने, ऑक्सीजन, दवाइयों की व्यवस्था करने में ही इतना थक गए कि खुलकर रो तक नहीं सके।
भय, दहशत और आंखों में छिपे रह गए ये आंसू अब घबराहट, अनिद्रा, सीने में दर्द, रात में किसी अनहोनी की आशंका में उठकर बैठ जाने जैसी दिक्कतों के रूप में सामने आ रहे हैं।
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जिला प्रशासन की ओर से नियुक्त कोविड मेंटल हेल्थ काउंसलर और केजीएमयू में मानसिक रोग विभाग के विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना मरीज पहले शारीरिक कष्ट से जूझे, अब उन पर मानसिक तनाव बुरी तरह हावी है। तेजी से बढ़ते इन मामलों में 20-40 फीसदी कोरोना से पैदा हुए तनाव के हैं।
मां चली गई, मैं रोना चाहती हूं, क्यों रहूं मजबूत
एक एमएलए की 17 साल की बेटी की मां को कोरोना ने छीन लिया। रिश्तेदारों ने कहा, रोना मत, मजबूत बनो, क्योंकि पापा को संभालना है। खुद भी संक्रमित हुई, लेकिन मां को बचाने का प्रयास करती रही। बेटी निगेटिव तो हो गई, लेकिन अब न तो उसे खाना अच्छा लगता है, न किसी से बात करती है। कैंब्रिज में एडमिशन हो गया, लेकिन न जाने का फैसला किया। काउंसिलिंग शुरू हुई तो बताया कि रात में लगता है कि मम्मी बुला रही हैं। डॉक्टर से कहती है कि मैं मां के मरने पर भी क्यों नहीं रो सकती हूं।
मास्क मत हटाओ, मैं मर जाऊंगी, परिवारवाले भी तनाव में
एक घर में कई लोग संक्रमित हुए। इस दौरान देवरानी की मौत हो गई। वहीं, जेठानी की तबीयत तो सुधरी, लेकिन वह ऑक्सीजन मास्क हटाने को तैयार नहीं हैं। उन्हें घर ले आया गया, लेकिन जब भी मास्क हटाने की बात कहो तो आक्रामक हो जाती हैं, कहती हैं मैं रात को मर गई तो। वहीं, घरवाले इस हालत में उन्हें देवरानी की मौत का सच भी नहीं बता पा रहे। इससे वे भी तनाव में हैं।
पिता को खोने के बाद अपनी व घरवालों की चिंता में जागने लगे
कोविड संक्रमित पिता को खोने के बाद एक शख्स का इलाज शुरू हुआ। समस्या थी कि वह रात को सो नहीं पा रहा था। इस चिंता में उठकर बैठ जाता कि कहीं मां को भी न खो दे या उसकी ही मौत न हो जाए। पत्नी या बच्चों को खो देने के डर से अजीब सी उलझन भी थी। मित्र की सलाह पर मनोचिकित्सक से मिले। एंटी एंग्जाइटी ट्रीटमेंट व काउंसिंलिंग से राहत मिली और कुछ दवाइयां दी गईं। अब वह एकदम सही हैं।
ग्रीफ काउंसिलिंग के प्रोटोकॉल का पालन जरूरी
कोविड मेंटर हेल्थ काउंसलर, जिला प्रशासन, डॉ. नेहा आनंद ने बताया कि ग्रीफ काउंसिलिंग का नियम है, जिसमें हमें समस्या लेकर आने वाले को सुनना होता है। उनके इमोशन को दबाना नहीं होता है, वह रोना चाहे, चिल्लाना चाहे उसे करने देना होता है। जरूरत है कि इस प्रोटोकॉल का पीड़ित के करीबियों को भी फॉलो करना होगा। यानी परेशान व्यक्ति को सुनें, रोने दें, जो कुछ दिल में है उसे निकल जाने दें।
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मनोचिकित्सक से मिलने में हिचकिचाएं नहीं
एसो. प्रो. डिपार्टमेंट ऑफ साइकेट्री, केजीएमयू, डॉ. सुजीत कुमार कार ने बताया कि कोरोना से अपने की मौत के बाद लोग खुद को मानसिक रूप से तैयार नहीं कर पा रहे हैं। युवाओं पर गहरा असर पड़ा है। अंतिम यात्रा में शामिल होने के बाद भी एक नेचुरल हीलिंग होती थी दुखों की। अभी यह सब बंद है। इलाज कैसे होगा, क्या करेंगे, मेरी भी मौत न हो जाए जैसे विचार डरा रहे हैं। कोविड से किसी भी तरह से प्रभावित हैं तो मनोचिकित्सक से मिलने में हिचकिचाएं नहीं। एक बार परामर्श जरूर ले लें।
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