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Lucknow News: आंकड़ों में प्रदूषण कमजोर, हकीकत में लोग बीमार

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लखनऊ में धूल से सनी पेड़-पौधे, कारों पर जमी धूल एवं जलता कूड़ा जिससे बढ़ता है प्रदूषण।  - फोटो : अमर उजाला
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लखनऊ। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े राजधानी की हवा को ठीक-ठाक या थोड़ा खराब बता रहे हैं। दूसरी ओर लोगों की तबीयत कुछ और ही कहानी कह रही है। शहर में इन दिनों आंखों में जलन, गले में खराश और एलर्जी आम हो गई है।
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अस्पतालों की ओपीडी में सर्दी, खांसी, दमा और एलर्जी के मरीजों की संख्या बढ़ी है। बच्चे, बुजुर्ग और सांस की बीमारी से परेशान लोग ज्यादा प्रभावित हैं। बलरामपुर अस्पताल में पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के प्रमुख डॉ. एके गुप्ता ने स्वीकार किया कि हाल के दिनों में प्रदूषण की वजह से ओपीडी में सांस के मरीजों की संख्या में 20 फीसदी का इजाफा हुआ है। लगभग सभी प्रमुख अस्पतालों में मरीजों को मास्क पहनने, सुबह और शाम घर में रहने की सलाह दी जा रही है।


आंकड़ों में सब ठीक, हकीकत पर उठ रहे सवाल

उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) के आंकड़ों में हालात संतोषजनक बताए जा रहे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि वास्तविक वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा है। शहर में सिर्फ छह सेंटर से आंकड़े लिए जाते हैं, जबकि अन्य जगहों पर प्रदूषण स्तर मापा ही नहीं जाता। इस संबंध में बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी जेपी माैर्या का पक्ष जानने के लिए रात 9:10 बजे छह बार काॅल किया गया, लेकिन उनका फोन नहीं उठा।
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पीले पड़ रहे पेड़, बीमार हो रही हरियाली

गोमतीनगर में बड़े पैमाने पर चल रहे निर्माण कार्य, खुले में उड़ती धूल ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। यही स्थिति अलीगंज और औद्योगिक क्षेत्र तालकटोरा की भी है। यहां धूल और धुएं ने लोगों की दिनचर्या को प्रभावित किया है। धूल और धुएं की चादर अब शहर की हरियाली का भी घोंटने लगी है। सांसों के लिए ऑक्सीजन और सुकून देने वाले हरे-भरे पेड़ धूल की चादर के नीचे पीले पड़ते जा रहे हैं। यह दृश्य एक गंभीर चेतावनी है।

लगाने होंगे ज्यादा एक्यूआई मापक सेंटर

बीते दिनों रिमोट सेंसिंग एप्लिकेशन सेंटर (आरएसएसी) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुधाकर शुक्ला की अगुवाई में किए गए पोस्ट-मानसून सर्वे में खुलासा हुआ था कि शहर की आबोहवा बेहद खराब है। रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने ये भी कहा था कि सिर्फ छह एक्यूआई सेंटरों से इसे मापना नाकाफी है। शहर के अधिक से अधिक इलाकों में नए एक्यूआई मॉनिटरिंग सेंटर लगाए जाने से ही सटीक तस्वीर सामने आएगी।

हकीकत कुछ, फसाना कुछ

- शहर के लोगों का आरोप है कि वायु गुणवत्ता मापन केंद्रों के सेंसरों के आसपास पानी का छिड़काव कर एक्यूआई रीडिंग को कम करने का प्रयास किया जाता है।
- पानी के छिड़काव से धूल के कण नीचे बैठ जाते हैं, जिससे एक्यूआई में सुधार दिखता है, जबकि शहर के अन्य हिस्सों में लोग जहरीली हवा में सांस लेने के लिए मजबूर रहते हैं।
- लखनऊ अब लगभग 500 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। यहां 40 लाख से ज्यादा लोग रहते हैं। इससे हवा में प्रदूषण का दबाव बढ़ता जा रहा है।
- विकास के नाम पर हरियाली घट रही है और उद्योगों के साथ ही सड़कों पर वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ी है। अनियंत्रित निर्माण कार्यों ने भी हवा की गुणवत्ता को बिगाड़ा है।



लखनऊ में धूल से सनी पेड़-पौधे, कारों पर जमी धूल एवं जलता कूड़ा जिससे बढ़ता है प्रदूषण। - फोटो : अमर उजाला

लखनऊ में धूल से सनी पेड़-पौधे, कारों पर जमी धूल एवं जलता कूड़ा जिससे बढ़ता है प्रदूषण। - फोटो : अमर उजाला

लखनऊ में धूल से सनी पेड़-पौधे, कारों पर जमी धूल एवं जलता कूड़ा जिससे बढ़ता है प्रदूषण। - फोटो : अमर उजाला

लखनऊ में धूल से सनी पेड़-पौधे, कारों पर जमी धूल एवं जलता कूड़ा जिससे बढ़ता है प्रदूषण। - फोटो : अमर उजाला

लखनऊ में धूल से सनी पेड़-पौधे, कारों पर जमी धूल एवं जलता कूड़ा जिससे बढ़ता है प्रदूषण। - फोटो : अमर उजाला

लखनऊ में धूल से सनी पेड़-पौधे, कारों पर जमी धूल एवं जलता कूड़ा जिससे बढ़ता है प्रदूषण। - फोटो : अमर उजाला

लखनऊ में धूल से सनी पेड़-पौधे, कारों पर जमी धूल एवं जलता कूड़ा जिससे बढ़ता है प्रदूषण। - फोटो : अमर उजाला

लखनऊ में धूल से सनी पेड़-पौधे, कारों पर जमी धूल एवं जलता कूड़ा जिससे बढ़ता है प्रदूषण। - फोटो : अमर उजाला

लखनऊ में धूल से सनी पेड़-पौधे, कारों पर जमी धूल एवं जलता कूड़ा जिससे बढ़ता है प्रदूषण। - फोटो : अमर उजाला

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