प्रदेश के हालात की तुलना अगर शतरंज के मैच से करें तो मुजफ्फरनगर के बहाने खेल का फाइनल सिर्फ दो खिलाड़ियों के बीच सिमटता दिखाई दे रहा है।
एक तरफ भाजपा और दूसरी तरफ सपा। बाजी किसके हाथ लगेगी, यह तो आगे पता चलेगा लेकिन इस मैच में स्थिति कुछ-कुछ वैसी ही दिखाई देने लगी है, जैसी 1990 में दिखाई दे रही थी।
समाजवादी पार्टी सरकार में है। दूसरे पाले में भाजपा खड़ी है। बाकी सियासी दल तो दर्शक की भूमिका में हैं या अतिरिक्त खिलाड़ी की भूमिका निभा रहे हैं। भाजपा सपा को निशाने पर लिए है तो सपा की तरफ से दुश्मन नंबर एक भाजपा को करार दिया जा रहा है।
राजनीतिक समीक्षकों का निष्कर्ष है कि यह हालात न तो अचानक बने हैं और न अनायास। सपा और भाजपा एक-दूसरे को शूट करती हैं। सोने में सुहागा तो तब और हो जाता है, जब सूबे में सपा की सरकार हो।
समाजवादी पार्टी की सरकार को यह सुविधा रहती है कि वह भाजपा का हव्वा खड़ा कर मुसलमानों को अपने साथ जोड़े रखे तो भाजपा को यह संदेश देने में सहूलियत रहती है कि हिंदू अगर भगवा खेमे के साथ न रहे तो उनका न जाने क्या होगा।
भले ही सरकार की नीयत ऐसी न हो लेकिन दुर्भाग्य से प्रशासनिक मशीनरी की भूमिका भी कुछ इस तरह की दिखाई देने लगती है, मानो सुनवाई सिर्फ एक वर्ग विशेष की ही होगी।
संयोग से लखनऊ से लेकर मुजफ्फरनगर और शामली के बीच दृश्य समीक्षकों के निष्कर्ष जैसे ही दिखते रहे हैं। लखनऊ में लोगों को सड़कों पर उत्पात करने का मौका मिला। कार्रवाई के नाम पर प्रशासन चुप रहा।
मुजफ्फरनगर की बात करें तो सरकार को दो युवकों के परिवार वाले तब निर्दोष दिखाई दिए और उनके परिवार के सदस्यों पर से दूसरे पक्ष के युवक की हत्या का मुकदमा तब हटाया गया, जब इस मुद्दे पर भड़की हिंसा ने हालात काफी बिगाड़ दिए।
हालांकि अब भी यह साफ नहीं है कि जिन लोगों ने इन दोनों युवकों के परिवार के लोगों पर मुकदमा लिखा या लिखाया था, उनके खिलाफ कार्रवाई होगी या नहीं।
इसी तरह शामली के एसपी को हटाने की जरूरत सरकार को तब महसूस हुई, जब यहां के हालात भी मुजफ्फरनगर जैसी स्थिति की ओर जाते दिखाई दिए। वैसे इस एसपी की बोली बानी और कार्रवाई में पक्षपात का आरोप तो लंबे समय से लग रहा था।
इसलिए याद आ रहा है 1990 से 1992 का वक्त
वर्ष 1990 से 1992 का वक्त याद आने के पीछे कुछ वजहें हैं। दरअसल, यही वह वक्त था जिस समय सूबे की सियासत ने हिंदू व मुसलमानों के आधार पर वोटों के ध्रुवीकरण का स्वाद चखा।
सियासत के पारखी मुलायम ने अयोध्या के मुद्दे पर ‘परिंदा को भी पर न मारने देने’ का ऐलान करके मुस्लिम हितों के संरक्षक नेता की छवि साबित की। यहां तक कि उन्हें नाराजगी में ही सही कुछ लोगों ने ‘मौलाना मुलायम’ तक की उपाधि दे दी।
मुलायम को भी इसमें सियासी फायदा दिखा तो उन्होंने विरोध नहीं किया। भाजपा को भी लाभ मिला। जिस भाजपा को सूबे में कांग्रेस व समाजवादियों के बाद तीसरे नंबर की पार्टी माना जाता था, उसने 33 प्रतिशत वोटों के साथ कल्याण सिंह के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली।
जिस जनता दल में मुलायम थे, उसे भी 22 प्रतिशत वोट मिले। 1992 में ढांचा ढहने के बाद मुलायम ने 1993 में समाजवादी पार्टी गठित की।
शायद मुलायम की मुस्लिम हितैषी छवि का ही कमाल था कि उन्हें नई पार्टी बनाने के कुछ महीनों के भीतर ही हुए चुनाव में (मुस्लिम-यादव समीकरण से)17.82 प्रतिशत वोट मिल गए।
भाजपा 177 सीटें हासिल करने के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बावजूद सरकार नहीं बना पाई। ऐसे में जिन समीकरणों ने दोनों दलों को ताकत दी, तो उन्हें ये पार्टियां बार-बार धार देने की कोशिश करेंगी ही।
यह भी है वजह
राजनीतिक समीक्षक अवधेश कुमार तर्क देते हैं कि समाजवादी पार्टी ने अपनी छवि ऐसी गढ़ ली है, जिसमें कुछ लोगों को लगता है कि उनके जायज-नाजायज सभी तरह के कामों को सरकार का संरक्षण मिलेगा।
इसीलिए 1991 के बाद जब-जब सपा सूबे में सत्ता में आती है तो ये लोग अनियंत्रित हो जाते हैं। इससे भाजपा को भी हिंदू हितैषी छवि को धार देने का मौका मिल जाता है। दरअसल, मुजफ्फरनगर की बात करें तो कुछ बातों को समझने की जरूरत है।
जनता ने जिस उम्मीद से सपा को उत्तर प्रदेश की सत्ता सौंपी थी, सपा मुखिया को भी कुछ दिन बाद यह एहसास हो गया कि उन उम्मीदों पर खरा उतरना असंभव नहीं तो काफी मुश्किल जरूर है। साथ ही घोषणा पत्र के वादों को भी अक्षरश: पूरा कर पाना कठिन है।
इसी के बाद समाजवादी सरकार व नेता मुस्लिम एजेंडे को धार देने की राह पर चल पड़े। चिंता वही कि मुस्लिम वोट अगर बसपा और कांग्रेस के बीच बंटा तो लोकसभा चुनाव में सपा का नुकसान होगा, जिसके दूरगामी नतीजे हो सकते हैं। इसके लिए भाजपा का हव्वा खड़ा करना जरूरी था।
सपा ने भाजपा का हव्वा दिखाया और मुसलमानों के संरक्षण का बार-बार ऐलान किया। जवाब में भाजपा को भी सपा के शक्तिशाली बनने से हिंदू समाज के संकट का संदेश देने का मौका मिला। इन समीकरणों ने कुछ जगह सांप्रदायिक तनाव के हालात पैदा किए और मुजफ्फरनगर में अपने चरम पर पहुंच कर हिंसा की नौबत ला दी।