चुनावी माहौल में प्रमोशन में आरक्षण पर सियासत फिर गरमाने लगी है।
सपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रो. रामगोपाल ने दो टूक कहा है कि प्रमोशन में आरक्षण बहाल करने के लिए सरकार सर्वोच्च न्यायालय का फैसला पलटने को विधेयक लाई तो हम सदन नहीं चलने देंगे।
सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव शुरू से ही इसके विरोधी हैं।
बसपा प्रमुख मायावती लगातार मांग कर रही हैं कि इसे बहाल करने और सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने के लिए संशोधन विधेयक लाया जाए। कांग्रेस-भाजपा इस पर असमंजस में हैं।
प्रमोशन में आरक्षण और परिणामी ज्येष्ठता के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाली सर्वजन हिताय संरक्षण समिति के अध्यक्ष शैलेन्द्र दुबे ने फिर ऐलान किया है कि कोर्ट का फैसला पलटने या बदलने की किसी भी कोशिश को अधिकारी व कर्मचारी स्वीकार नहीं करेंगे। ऐसा हुआ तो हम तुरंत हड़ताल पर चले जाएंगे।
कहा, जो लोग सामान्य व पिछड़ों को दलितों का दुश्मन बता रहे हैं वे स्थितियों को गलत ढंग से परिभाषित करके अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजातियों के दिमाग में यह बैठाने की कोशिश कर रहे हैं कि सामान्य व पिछड़े वर्ग के अधिकारी व कर्मचारी उनके दुश्मन हैं।
सच यह है कि सामान्य व पिछड़े वर्ग का कोई व्यक्ति अनुसूचित जाति व जनजाति को नौकरी में आरक्षण देने का विरोधी नहीं है।
उधर, आरक्षण बहाल रखने के पक्ष में आंदोलन चला रहे संगठन आरक्षण बचाओ संरक्षण समिति के संयोजकों में शामिल अवधेश वर्मा कहते हैं कि सरकार को अनुसूचित जाति व जनजाति को मिलने वाले आरक्षण का लाभ बहाल करना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो आंदोलन होगा।
एक संभावना यह भी
संसद के इस सत्र में यह विधेयक आएगा या नहीं, इस पर असमंजस है। केंद्र सरकार फिलहाल मौन साधे है।
राज्यसभा में इस विधेयक के पक्ष में खड़ी भाजपा ने भी लोकसभा में चुप्पी साध रखी है। इसलिए एक संभावना यह दिख रही है कि इस मुद्दे पर कोई बात जुबानी जमा खर्च से आगे ही न बढ़े। विधेयक आए ही नहीं।
कांग्रेस में भी इसे बहाल करने पर एक राय नहीं है। केंद्रीय मंत्रिमंडल के कुछ सदस्य पूरी आरक्षण व्यवस्था पर पुनर्विचार की मांग उठाकर एक तरह से अपनी असहमति सार्वजनिक कर चुके हैं।
यह हैं कारण
इस मुद्दे पर पूरे देश में जिस तरह आंदोलन हुए उससे कांग्रेस और भाजपा दोनों में दो धड़े बन गए हैं।
एक धड़ा अनुसूचित जाति, जनजाति के वोटों को जोड़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने के लिए विधेयक पारित कराने पर जोर दे रहा है।
इसका कहना है कि अगर फैसला पलटा नहीं गया तो अनुसूचित जाति और जनजाति का वोट छिटक जाएगा। दूसरा, इससे नया संकट खड़ा होने की आशंका जता रहा है।
इस धड़े का तर्क है कि फैसला पलटने से नुकसान ज्यादा और लाभ कम होगा। लाभ सिर्फ सपा और बसपा को मिलेगा।
बसपा जिस तरह कोर्ट का फैसला पलटने के लिए विधेयक पारित कराने की मांग कर रही है, उसके मद्देनजर बसपा प्रमुख मायावती यह दावा करने से नहीं चूकेंगी कि उन्होंने दबाव डालकर पदोन्नति में आरक्षण व परिणामी ज्येष्ठता का लाभ बहाल करवाया है।
मुलायम कहेंगे कि सिर्फ वही सामान्य व पिछड़ों के हक के लिए लड़ सकते हैं। इसलिए सबसे सुरक्षित रास्ता यही है कि मामला जस का तस रहे।
क्या है पदोन्नति में आरक्षण
अगर 100 पद हैं तो उनमें 18 प्रतिशत पर अनुसूचित जाति और 2 प्रतिशत पर अनुसूचित जनजाति के लोग पदोन्नत होंगे। शेष पर सामान्य वर्ग के लोगों की पदोन्नति होगी।
अगर कहीं आरक्षित वर्ग का कोई अधिकारी या कर्मचारी पदोन्नति पाने की शर्त पूरी कर रहा है तो उसे ऊपर के अनारक्षित पद पर भी पदोन्नति दी जा सकती है।
सर्वजन हिताय संरक्षण समिति का तर्क है कि नौकरी में जब आरक्षण मिल चुका है तो पदोन्नति में देने से ज्येष्ठता का सिद्धांत प्रभावित होता है।
क्या है परिणामी ज्येष्ठता
इसका अर्थ है अनुसूचित जाति या जनजाति के अधिकारी-कर्मचारी को पदोन्नति के पद पर भी वरिष्ठता का लाभ देना।
सर्वजन हिताय संरक्षण समिति के राष्ट्रीय संयोजक ओमप्रकाश पांडेय कहते हैं कि पदोन्नति में आक्षण के चलते आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों व अधिकारियों को आमतौर पर पांच से सात वर्ष में पदोन्नति मिल जाती थी। सामान्य व पिछड़ों को 22 से 25 साल इंतजार करना पड़ता था।