वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि लाल कहते हैं कि पिछले दो दशक में बने सियासी दलों पर नजर डालने से तीन निष्कर्ष निकलते हैं। पहला, कल्याण सिंह जैसे नेताओं ने अपनी मूल पार्टी से अलग होकर इसलिए नया दल बनाया कि कुछ नेताओं की गुटबाजी से नाराज वह अपनी हैसियत दिखाना चाहते थे। इसमें वह कामयाब भी हुए। शिवपाल भी इसी राह पर चलते दिख रहे हैं। हालांकि कल्याण की तरह इनके मूल पार्टी में लौटने की संभावनाएं कम ही हैं।
दूसरा, अपना दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, पीस पार्टी, निषाद पार्टी जैसे दलों के बनाने के पीछे कुछ क्षेत्र विशेष के राजनीतिक, जातीय और अन्य समीकरणों के सहारे अपनी सियासी हैसियत बनाना तथा बड़े दलों के साथ सत्ता में भागीदारी करना दिखता है। जहां तक छह बार निर्दलीय विधायक रह चुके रघुराज प्रताप सिंह के नया दल बनाने की बात है तो वे यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्होंने अब प्रदेश के साथ राष्ट्रीय राजनीति में भी प्रवेश का फैसला कर लिया है।
कल्याण सिंह ने भाजपा से अलग होने के बाद राष्ट्रीय क्रांति पार्टी बनाई। भाजपा का गणित बिगाड़ा। वे 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा में लौट आए, लेकिन लोकसभा चुनाव 2009 से पहले भाजपा से अनबन के बाद उन्होंने जन क्रांति पार्टी बना ली। हालांकि यह पार्टी भी चल नहीं पाई। कल्याण इस समय राजस्थान के राज्यपाल हैं। मुलायम से नाराज होकर बेनी प्रसाद वर्मा ने समाजवादी क्रांति दल बनाया, पर यह बेनी बाबू को कांग्रेस का नेता बनाने तक ही चला। बेनी बाबू अब फिर सपा में हैं। उनके दल का पता नहीं। अमर सिंह ने भी सपा से अलग होकर लोकमंच बनाया और चुनाव लड़े, पर अमर की सपा में वापसी के साथ यह खत्म हो गया। अमर अब राज्यसभा के सदस्य हैं। उमा भारती, आरके चौधरी, नरेंद्र चौधरी, श्याम सुंदर शर्मा सहित प्रदेश के कई नेताओं ने मूल पार्टी से नाराज होकर नया दल बनाया, पर बहुत कुछ कर नहीं पाए। सोनेलाल पटेल ने भी बसपा से अलग होकर अपना दल बनाया था, लेकिन यह भी बहुत विस्तार नहीं पा सका। भाजपा के सहयोग से लड़े अपना दल के इस समय नौ विधायक हैं। पर, इस दल में भी मां-बेटी में वर्चस्व का झगड़ा चल रहा है।