मुजफ्फरनगर दंगा सियासी लोगों ने कराया था। कवाल में शहजाद और सचिन व गौरव की हत्या के बाद उन्होंने समाज को बांटने वाला वातावरण बनाया। पंचायतों में भड़काऊ भाषण दिए, अफवाहें फैलाईं, आपत्तिजनक संदेशों का आदान-प्रदान किया। नतीजा सांप्रदायिक दंगे के रूप में सामने आया।
मुजफ्फरनगर दंगे की जांच के लिए गठित जस्टिस विष्णु सहाय आयोग ने अपनी रिपोर्ट में दंगे के लिए सियासी नेताओं को ही जिम्मेदार ठहराया है। सूत्रों के मुताबिक जांच आयोग के समक्ष दी गई गवाही में कई अफसरों और पब्लिक की ओर से दी गई गवाही में इस तरह की बातें कही गई हैं।
जांच आयोग ने नौकरशाही पर इसलिए नरमी के संकेत दिए हैं कि हालात इतने विस्फोटक हो गए थे उस पर नियंत्रण करना अधिकारियों के लिए आसान नहीं था। मुजफ्फरनगर के कवाल गांव में 27 अगस्त 2013 को कथित तौर पर लड़की से छेड़छाड़ के विवाद में शहजाद की हत्या कर दी गई थी। उसकी हत्या के आरोपी सचिन और गौरव को भी कवाल गांव में मौके पर ही मार डाला गया था।
इस घटना के दिन ही मुजफ्फरनगर के तत्कालीन डीएम सुरेंद्र सिंह और एसएसपी मंजिल सैनी का तबादला कर दिया गया था। इसके बाद पंचायतों का दौर चला। सात सितंबर को नंगला मदौड़ में महापंचायत के बाद कई स्थानों पर हिंसा भड़क उठी थी। इसके अगले दिन तो हिंसा का नंगा नाच हुआ।
इसकी आंच शामली, बागपत, मेरठ और सहारनपुर तक पहुंची। दंगे के करीब दो साल बाद जांच आयोग के अध्यक्ष जस्टिस विष्णु सहाय ने अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंप दी है। 775 पेज की यह रिपोर्ट गवाहों के बयानों और साक्ष्यों पर आधारित है।
नेताओं के गैरजिम्मेदार व भड़काऊ भाषण जिम्मेदार
जांच आयोग ने 27 अगस्त को तीन युवाओं की हत्या की घटना के समय और उसके बाद दंगे के दौरान मुजफ्फरनगर और शासन में तैनात रहे अधिकारियों से पूछताछ की और उनके बयान दर्ज किए। आमतौर पर अफसरों ने दंगे के लिए नेताओं के गैरजिम्मेदार और भड़काऊ भाषणों को जिम्मेदार ठहराया है। भाजपा नेता उनके ज्यादा निशाने पर रहे।
हालांकि सपा और बसपा के कुछ नेताओं की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। पब्लिक के गवाहों ने नेताओं के साथ ही अफसरों की भूमिका पर भी सवालिया निशान लगाए हैं। उनके खिलाफ आयोग को साक्ष्य दिए हैं। आयोग ने इन सबका संज्ञान लिया है।
भड़काऊ भाषणों की ऑडियो कैसेट दी
जांच के दौरान कुछ नेताओं के भड़काऊ भाषणों की ऑडियो कैसेट भी आयोग को मुहैया कराई गई हैं। आयोग ने इनका भी संज्ञान लिया है। इनसे न केवल उत्तेजना फैली, बल्कि माहौल सांप्रदायिक बना।
कवाल में तीन हत्याओं की आपराधिक घटना पर सांप्रदायिक रंग चढ़ गया। उत्तेजना फैलाने वालों में हालांकि दोनों पक्षों के लोग थे, लेकिन कुछ भाजपा नेताओं ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। अफवाहों ने उत्तेजना को दंगे के रूप में तब्दील करने में मदद की।
एक तरफा कार्रवाई ने किया आग में घी का काम
पब्लिक के गवाहों ने कवाल की घटना में निष्पक्ष कार्रवाई न किए जाने को विवाद बढ़ने की वजह बताया है। पक्षपातपूर्ण कार्रवाई के लिए दबाव बनाने का आरोप भी नेताओं पर ही है। उन्होंने सवाल उठाया है कि शहजाद की हत्या सचिन और गौरव ने उसी के घर के पास की थी। इसके बहुत सारे चश्मदीद थे।
गांव के कुछ लोगों ने मौके पर ही सचिव व सौरव की भी हत्या कर दी थी। इसके बावजूद शहजाद की हत्या में फर्जी नामजदगी करा दी गई। यदि अफसर निष्पक्ष कार्रवाई करते तो लोगों का गुस्सा न बढ़ता।
आपत्तिजनक संदेशों व वीडियो फुटेज का हुआ आदान-प्रदान
दंगा भड़काने में सोशल मीडिया की भूमिका भी सामने आई है। कुछ असामाजिक तत्वों और सियासी लोगों ने इसका गलत इस्तेमाल किया। आपत्तिजनक संदेशों और वीडियो फुटेज का आदान-प्रदान किया गया।
ऐसी क्लिपिंग भी मोबाइल पर खूब चलीं जिनका मुजफ्फरनगर दंगे से कोई लेना-देना नहीं था। इन क्रूर घटनाओं को मुजफ्फरनगर से जोड़कर भावनाएं भड़काने में मदद की गई।
अफसरों पर नरमी के संकेत
दंगे की जांच रिपोर्ट में पुलिस और प्रशासनिक अफसरों के प्रति नरमी केसंकेत हैं। समझा जा रहा है कि आयोग ने अफसरों पर सख्त टिप्पणियां तो की हैं लेकिन उनके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश में इसलिए नरमी बरती गई कि विस्फोटक हालात में उनकी कोशिशों में सीधे तौर पर ज्यादा खामियां नजर नहीं आई हैं। यदि कहीं उनका दोष दिखा भी तो इसके पीछे राजनीतिक कारण ज्यादा रहे।