सिंह की आपत्ति पर क्या होता है, यह तो भविष्य बताएगा। पर, ताजा घटनाक्रम से ये चुनाव खासे दिलचस्प होते जा रहे हैं। बता दें, पहले यह बैंक राज्य सहकारिता निबंधक के यहां पंजीकृत था और एक राज्य स्तरीय संस्था थी। लेकिन उत्तराखंड अलग राज्य बनने से बैंक की कुछ शाखाएं वहां रह गईं।
दूसरे राज्य में शाखाएं होने के नाते केंद्रीय सहकारिता निबंधक ने इसे बहुराज्यीय संस्था घोषित कर दिया और तत्कालीन बोर्ड ने सदस्य बनाने और ऋण स्वीकृत करने का अधिकार भी सभी शाखाओं पर शाखा सदस्य की अध्यक्षता में बनी समिति को दे दिया था। 2012 में प्रदेश में सपा सरकार बनने के बाद 2013 में बैंक को भी राज्य निबंधक के यहां पंजीकृत कराते हुए इसे राज्यस्तरीय संस्था अधिसूचित कर दिया गया।
सरकार बनने पर अन्य सत्तारूढ़ दलों की तरह भाजपा ने भी सहकारी संस्थाओं पर चुनाव के जरिए अपने लोगों की ताजपोशी शुरू कराई। सहकारी ग्राम्य विकास बैंक की प्रबंध समिति पर भी अपने लोगों को बैठाने के लिए सदस्य बनाए। अब जब चुनाव घोषित हो गया है तो नए सदस्यों की सदस्यता पर सवाल उठाया गया है। ऐसे में सहकारी समिति निर्वाचन आयोग का फैसला अहम भूमिका निभाएगा।