विरोधी दल, मोदी की उद्योगपतियों से नजदीकी पर सवाल उठाते रहते हैं। शायद इसी वजह से प्रधानमंत्री ने देश के सबसे बड़े राज्य यूपी की राजधानी लखनऊ में उद्योगपतियों के जमावड़े को ही इन सवालों का जवाब देने के लिए चुना।
देश के विकास में उद्योगपतियों के योगदान का उल्लेख तथा महात्मा गांधी और बिड़ला की नजदीकी का हवाला देकर लोगों के दिमाग में यह बैठाने की कोशिश की कि विपक्ष की तरफ से अकारण तिल का ताड़ बनाया जा रहा है। मोदी ने इस आयोजन के बहाने यह बताने का प्रयास किया है कि उद्योगपतियों से उनकी नजदीकी पर सवाल उठाने वाले वास्तव में देश का विकास रोकना चाहते हैं।
हमलों को हथियार बनाने में माहिर मोदी ने खूबसूरती के साथ इस कार्यक्रम के जरिये सियासी लड़ाई को चार बनाम सत्तर साल में तब्दील करने की कोशिश की। मोदी जानते हैं कि लोकसभा चुनाव के दौरान पर इस बार उन्हें विरोधियों पर हमला नहीं, बल्कि अपने काम बताने होंगे।
इसीलिए मोदी ने बिजली, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य सहित जनता के सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर अपनी सरकार के काम और इरादों का हवाला देते हुए यह मुद्दा भी उछाल दिया कि जो लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि मोदी चार साल में यह काम क्यों नहीं कर पाए, उन्हें यह जवाब देने को भी तैयार रहना चाहिए कि 70 साल में वह काम क्यों नहीं हो पाया?
साफ है कि मोदी लड़ाई को 4 बनाम 70 साल के साथ काम करने वाले और बस बात करने वालों के बीच भी केंद्रित करने की तैयारी में हैं। चुनाव में अगर कुछ उद्योगपतियों के भाग जाने का सवाल विपक्ष की तरफ से उछले उससे पहले ही भाजपा ने यह सवाल उठाएगी कि 70 साल सरकार चलाने वालों ने इन घोटालेबाजों पर कार्रवाई क्यों नहीं की।
सभी को पता है कि अटल बिहारी वाजपेयी का नाम लोगों को न सिर्फ भावात्मक रूप से, बल्कि सरोकारी, संवेदनशील और काम करने वाले नेता के रूप में भी आकर्षित करता है। विपक्ष अटल के काम की अनदेखी के सवाल पर भी मोदी को घेरता रहा है। इसीलिए मोदी ने दोनों दिन अटल के नाम का उल्लेख किया। साथ ही कुछ उदाहरण देकर यह बताने की कोशिश की कि उनकी सरकार अटल के सपनों को पूरा करने के रास्ते पर ही चल रही है। वह काम कर रहे हैं, इसलिए सवाल भी उठाए जा रहे हैं।