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भाजपा की हार: मोदी को झटका, अखिलेश को मौका

Sun, 27 Jul 2014 02:01 AM IST
अखिलेश वाजपेयी/अमर उजाला, लखनऊ
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भले ही भाजपा की यह हार उत्तराखंड में हुई है। पर, इन नतीजों में उत्तर प्रदेश की सपा और भाजपा के लिए भी संदेश छिपे हुए हैं। संदेशों में हिदायत भी है तो चेतावनी भी।
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यह नतीजे समाजवादी पार्टी को सहारा दे सकते हैं। बशर्ते इसका लाभ लेने के लिए सपा नेतृत्व कड़े फैसले लेने की हिम्मत दिखाए। चुनौतियों से पार पाने का भरोसा दे।

रही बात भाजपा की तो उसके लिए चेतावनी है कि केंद्र में सरकार बनने और पहली बार अपने दम पर बहुमत हासिल कर लेने के बावजूद निश्चिंत बैठना उसके लिए घातक हो सकता है।
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भाजपाइयों के लिए संदेश

उत्तर प्रदेश के संदर्भ में इन नतीजों का गहराई से विश्लेषण करें तो दो बातें दिखती हैं। एक तो यह कि उत्तराखंड का नतीजा स्थानीय लोगों की भावना की अभिव्यक्ति है।

जनता ने मनपसंद फैसला करने के लिए कांग्रेस को पुरस्कृत किया है। दूसरा नतीजों ने भाजपा सांसदों व स्थानीय नेताओं को चेताया है कि लोकसभा चुनाव में भारी जीत को वह जनता के मूड में बदलाव और शेष दलों के युग की समाप्ति समझने की भूल न करें।

लोकसभा की जीत न तो भाजपा की स्थायी स्वीकार्यता है और न कांग्रेस या अन्य दलों की हमेशा-हमेशा के लिए अस्वीकार्यता।

जनता के सम्मान की जीत

लोकसभा चुनाव में भाजपा की जीत हो या उपचुनाव में उत्तराखंड में कांग्रेस की जीत। दोनों जनाकांक्षा के सम्मान की जीत है। लोकसभा चुनाव से पहले जनता की तरफ से मोदी लाओ का नारा गूंज रहा था। संघ नेतृत्व ने जनता के मूड और इच्छा को समझा।

उसने भाजपा के बड़े-बड़े दिग्गजों के दावे को झटका देते हुए मोदी को कमान सौंप दी। जीतने पर प्रधानमंत्री बनाने की घोषणा भी करा दी। जनता दिल खोलकर भगवा मंडली के साथ खड़ी हो गई।

उत्तराखंड में भी विधानसभा के चुनाव के बाद कांग्रेस नेतृत्व ने भले ही विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री बना दिया था परंतु सच यह है कि वहां की जनता पहले दिन से ही हरीश रावत को सरकार की कमान सौंपने की मांग कर रही थी।

नतीजों के जरिये जनता ने कांग्रेस को बता दिया है कि उत्तराखंड के लोग ‘रावत लाओ’ की आवाज यूं ही नहीं उठा रहे थे। जनता ने राजनीतिक दलों को फिर से यह समझाने की कोशिश की है कि कांग्रेस नेतृत्व ने उनकी पसंद पर भरोसा किया, इसलिए उन्होंने भी कांग्रेस पर भरोसा किया।

सपा लाभ चाहती है तो करना होगा फैसला

राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि उत्तराखंड के नतीजे समाजवादी पार्टी के लिए सहारा ही नहीं ताकत भी बन सकते हैं।

बशर्ते सपा नेतृत्व समय रहते इन नतीजों के संदेशों व संकेतों को समझकर उन पर काम करने का फैसला करे। इस समय प्रदेश सरकार कानून-व्यवस्था सहित कुछ अन्य मसलों पर कठघरे में खड़ी है। भले ही बहुत मुखर न सही लेकिन सरकार के नेतृत्व को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

समीक्षकों का कहना है कि यह तो नहीं कहा जा सकता कि सपा क्या करेगी। पर, सपा को सरकार व मुख्यमंत्री की क्षमता पर जनता के बीच भरोसा पैदा करने के लिए दो टूक फैसला करना होगा।
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ये होगा जीत ‌का मंत्र

नतीजों ने भाजपा और संघ नेतृत्व को आगाह किया है कि मोदी के नाम पर स्थानीय मुद्दों व परिस्थितियों की अनदेखी नहीं चलेगी। गुटबाजी को खत्म न किया गया तो पार्टी की झोली में जीत नहीं आएगी।

उत्तराखंड में भाजपा भुवन चंद्र खंडूरी, भगत सिंह कोश्यारी और रमेश पोखरियाल के गुट में बंटी थी। स्थानीय नेता भी इसी कारण गुटों में बंधे रहे। नतीजा पार्टी हार गई।

हालांकि राजनीतिक समीक्षक रतन मणि लाल कहते हैं कि उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की परिस्थितियां अलग हैं। उत्तराखंड में भाजपा के कार्यकर्ताओं को गतिशील करने वाला नेतृत्व नहीं था।

उत्तर प्रदेश में भाजपा अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को गतिशील भी किया है और वह सरकार पर आक्रामक भी हैं। अलबत्ता गुटबाजी से मुक्ति की चुनौती जरूर सामने है। जरा सी चूक भाजपा को झटका दे देगी।
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