हाल में बिजली महकमे के एक आला हाकिम ने अपनी आत्मकथा लिखी। ‘सरकार’ के हाथों किताब का विमोचन हुआ।
किताब में अधिकारी ने अपने जीवन में आए उतार-चढ़ाव का दिलचस्प तरीके से खाका खींचा है। अधिकारी ने किताब में कई नौकरशाहों का जिक्र भी किया है।
जिन नौकरशाहों की तारीफ की है वे तो गद्गद हैं लेकिन जिनकी थोड़ी बहुत आलोचना की है उन्हें यह किताब रास नहीं आ रही है।
ऐसे ही एक अधिकारी आजकल दिल्ली में प्रतिनियुक्ति पर हैं। उन्हें किताब के बारे में भनक लगी तो लखनऊ में अपने शुभचिंतकों से फोन करके पूछने लगे, भई मेरे बारे में क्या राय जाहिर की है?
जिन्होंने किताब देखी नहीं वे तो चुप्पी साध गए लेकिन जिन्होंने पढ़ी है वे नमक-मिर्च लगाकर बताने में पीछे नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि ब्यूरोक्रेसी में ही किताब को लेकर दो खेमे हो गए हैं।
एक लेखक की तारीफ कर रहा है तो दूसरा उनके दुस्साहस पर लाल-पीला हो रहा है। विरोधी खेमा कह रहा है, उम्मीद तो थी कि वे रिटायरमेंट के बाद सियासी पारी खेलेंगे, लेकिन उन्होंने तो पहले ही शुरू कर दी।