इस साल का बजट आया तो तमाम लोग असहज। सबसे ज्यादा हैरान-परेशान एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी हैं जो अपने हिसाब से हुकूमत को तमाम अच्छी-अच्छी सलाह देते-देते इधर से उधर हो गए।
इनका दर्द है कि जब वे इस तरह के तर्कसंगत विकल्प पर गौर करने की बात कहते थे, तब लोग भड़क जाते थे और अब वही सब खुद को सरकार का शुभचिंतक साबित करना चाहते हैं।
जिस तरह से कन्या विद्याधन, लैपटॉप, बेरोजगारी भत्ता, हमारी बेटी-उसका कल, साड़ी-कंबल जैसी योजनाएं खत्म की गईं, उससे वे बेचैन हैं। कहते हैं कि इन सभी योजनाओं को इस तरह बिल्कुल खत्म नहीं करना चाहिए था।
ये घोषणापत्र के वादे थे। इनमें तुष्टीकरण वाली खत्म करनी चाहिए जबकि संतुष्टीकरण वाली जारी रखनी चाहिए। कुछ के स्वरूप में बदलाव कर सकते थे। इसके लिए दूसरे राज्यों के उदाहरण सामने थे।
पर, जिस तरह से यह कदम उठाया गया है, उससे युवा वर्ग में बड़ी नाराजगी होगी। अगले 20 साल तक यह वर्ग ही चुनावी जीत-हार तय करेगा।
इसके विकल्प में जो प्रस्ताव किए गए हैं, वे युवाओं में न तो रोजगार के लिए भरोसा पैदा कर पा रहे हैं और न ही नौकरी के। राम ही मालिक...।