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यहां राजनाथ ही बने भाजपा की चिंता का कारण

Wed, 16 Apr 2014 03:40 AM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, लखनऊ
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जोड़तोड़ की राजनीति में माहिर भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह के अटल के गढ़ में पहुंचते ही पैदा हुए नए समीकरणों ने भाजपाइयों को बेचैन कर दिया है।
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कांग्रेस की शहर अध्यक्षी छोड़ नीरज बोरा ने भाजपा के समर्थन का ऐलान तो किया लेकिन पार्टी में शामिल नहीं हुए। भाजपाई इसके मायने तलाशने में जुटे हैं।

दूसरी ओर पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने जिस अंदाज में एंट्री की है वह भी स्थानीय नेताओं की धुकधुकी बढ़ाने के लिए काफी है।

मामला बड़े नेता से सीधा जुड़ा होने के कारण कोई खुलकर तो अपनी असहमति नहीं जताना चाहता। पर, अंदर ही अंदर लोगों को 14 साल पहले की घटना याद आने लगी है।

भाजपा के हाथ से निकल गई हैदरगढ़ सीट

वर्ष 2000 में जब राजनाथ मुख्यमंत्री बने थे, तब उन्होंने विधानसभा की सदस्यता वाया कांग्रेस विधायक सुरेन्द्र अवस्थी उर्फ पुत्तू की सीट से ली थी। पुत्तू उस समय बाराबंकी की हैदरगढ़ सीट से विधायक थे।

रातोंरात ऐसे समीकरण बदले कि पुत्तू ने राजनाथ की तारीफ करते हुए कांग्रेस छोड़ भाजपा का साथ देने की घोषणा कर दी। भाजपा ने उन्हें विधान परिषद भेजा।

इस प्रयोग से राजनाथ सिंह तो दो बार विधायक निर्वाचित हो गए। पर, हैदरगढ़ सीट को कई बार पुत्तू से छीनने वाले बाराबंकी के प्रमुख भाजपा नेता सुंदरलाल दीक्षित हमेशा के लिए साइडलाइन हो गए।

इतना ही नहीं भाजपा भी वहां दोबारा पांव नहीं जमा सकी।

नीरज बोरा पर कश्मकश

नीरज बोरा विधानसभा के चुनाव में लखनऊ उत्तर सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े थे। वह दूसरे नंबर पर रहे थे।

तीसरे नंबर पर भाजपा के वरिष्ठ नेता लालजी टंडन के पुत्र गोपाल टंडन रहे थे। साथ ही नीरज बोरा नगर निगम के चुनाव में भी कांग्रेस की तरफ से महापौर डॉ दिनेश शर्मा के मुकाबले उतरे थे।

इसलिए भले ही नीरज बोरा ने भाजपा में आने के बजाय अभी सिर्फ समर्थन की बात कही हो लेकिन भाजपाइयों की बेचैनी इससे कम नहीं हो पा रही है।

उन्हें यह आशंका सताने लगी है कि भविष्य में नीरज बोरा को विधानसभा या अन्य कोई चुनाव जरूर लड़ाया जाएगा।

वैश्य समुदाय के दूर जाने का डर

नीरज बोरा कांग्रेस के अध्यक्ष तो थे ही साथ ही वे वैश्य फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। उनके ऐलान ने सिर्फ सियासी महत्वाकांक्षा रखने वाले वैश्य नेताओं को ही नहीं पुराने व्यापारी नेताओं को भी सकते में डाल दिया है।

शायद यही वजह रही कि पार्टी के नेता सुधीर हलवासिया ने आनन-फानन में वैश्यों की अपने यहां बैठक बुलाकर यह संदेश देने की कोशिश की कि बिरादरी के लोगों को इधर-उधर देखने की जरूरत नहीं है।

नीरज ही नहीं बल्कि जिस तरह पिछले कुछ दिनों में विभिन्न दलों के पार्षदों व पूर्व पार्षदों ने भाजपा में इंट्री ली है, उसे लेकर पार्टी नेता भले ही अपना जनाधार बढ़ने का दावा करके अपनी पीठ थपथपा रहे हों, लेकिन हर गली मोहल्ले में नई खींचतान दिख रही है।

बाहर से ही भाजपा का समर्थन

नीरज ने भाजपा में शामिल होने का ऐलान करने से यूं ही नहीं परहेज किया है। यह सोची समझी रणनीति का हिस्सा है।

नीरज के भाजपा में शामिल होने से भाजपा के भीतर विद्रोह की आशंका थी, इसलिए यह तरीका चुना गया।

जिससे कम से कम लोकसभा चुनाव के बीच राजधानी के भाजपाइयों में कोई प्रतिक्रिया न हो। दूसरे बोरा वैश्य फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं।

सीधे किसी पार्टी में जाने से उनके ऊपर कई सवाल खड़ हो सकते थे। इसलिए भी उन्होंने पार्टी में शामिल होने के बजाय समर्थन का रास्ता चुना।
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सुधांशु ने बढ़ाई दिक्कतें

राजनाथ ने तीन दिन के लखनऊ प्रवास के दौरान जिस तरीके से भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी का परिचय कराया और तवज्जो दी उससे बाकी नेताओं की धुकधुकी बढ़ गई है।

लोगों का मानना है कि सुधांशु त्रिवेदी की खुद अपनी राजनीतिक इच्छाएं हैं। उन्हें भी यह इच्छाएं राजधानी से परवान चढ़ती हुई दिख रही है।

इसलिए राजनाथ के चुनाव प्रबंधन के बहाने उन्होंने भी अपनी मंजिल की ओर कदम बढ़ा दिए हैं। जिनसे पार्टी के कई नेताओं को अपना भविष्य अंधकारमय दिख रहा है।
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