पुलिस के कुछ आला अफसर अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए मातहतों को ऐसे निर्देश जारी कर रहे हैं जिनसे उनके पसीने छूट रहे हैं।
एक दिन में दो-तीन अभियान चलाने, विभिन्न योजनाओं के संचालन आदि के निर्देश जारी हो रहे हैं। ये निर्देश सिर्फ एक अधिकारी के स्तर से नहीं जारी हो रहे हैं बल्कि उच्च पदों पर तैनात कई अधिकारी अलग-अलग निर्देश दे रहे हैं।
जिलों में तैनात अफसरों के इससे पसीने छूट रहे हैं। उनका कहना है कि इनकी तो मौज है, काम के नाम पर सिर्फ निर्देश। अमल तो हमें करना है।
अब सभी योजनाओं और अभियान पर ही अमल करें तो पुलिसिंग कब करेंगे, थाने पर कब बैठेंगे और मुकदमों की तफ्तीश कब होगी?
ऊपर वालों को इससे क्या लेना-देना? कानून-व्यवस्था की फिक्र किसे है? सारी कवायद इसकी है कि ‘बड़े साहब’ की गुडबुक में बने रहें ताकि कुर्सी सलामत रहे।