मोदी का गरीबों और महिलाओं पर फोकस यूं ही नहीं था। गहराई से सभी पहलुओं और वर्ष 2014 से अब तक हुए तीन चुनाव के नतीजों व मतदाताओं के रुझान पर नजर डालें तो यह कोई भी समझ सकता है कि गरीब, दलित, पिछड़े और महिलाएं लगातार मतदान को प्रभावित कर रही हैं।
मोदी और अमित शाह ने इसी सामाजिक गणित पर फोकस करते हुए समग्र हिंदुत्व के एजेंडे को सेट करते हुए इन्हें भाजपा के साथ जोड़कर वोटों का गणित ठीक किया है। साथ ही भाजपा की अगड़ों और शहरी पार्टी होने की छवि को बदला है। इसलिए प्रधानमंत्री की कोशिश आज 4000 करोड़ रुपये की परियोजनाओं की शुरुआत करते हुए यह समझाने पर ज्यादा दिखी कि ये योजनाएं सिर्फ शहरों की सूरत बदलने नहीं जा रही है, बल्कि गरीबों, महिलाओं, मलिन बस्तियों में रहने वाले लोगों की जिंदगी बदलने का सपना भी साकार करने जा रहा है।
इनके लिए वर्ष 2022 में प्रदेश में भाजपा की सरकार आना जरूरी है। तभी तो उन्होंने कांग्रेस का नाम भले ही नहीं लिया, लेकिन यह बताना जरूरी समझा कि केंद्र में उनकी सरकार आने से पहले अर्थात वर्ष 2014 से पूर्व की सरकार ने देश के गरीबों के लिए सिर्फ 13 लाख मकान मंजूर किए गए थे। उनमें सिर्फ 8 लाख ही बन पाए। जबकि उनकी सरकार ने 2015 से अब तक 1.13 करोड़ आवास स्वीकृत किए और इनमें 50 लाख बनवा भी दिए।
प्रधानमंत्री ने लखनऊ में विकास के सहारे समग्र व समावेशी हिंदुत्व के संदेश को गाढ़ा करने की कोशिश की। हालांकि उन्होंने हिंदुत्व शब्द का प्रयोग नहीं किया, लेकिन जिस तरह यूपी को राम, कृष्ण और भगवान बुद्ध की भूमि बताते हुए इसके सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित किया।
अयोध्या में इस दिवाली 7.5 लाख दीए जलने का उल्लेख करते हुए प्रदेश में 9 लाख आवास पाने वाले लाभार्थियों से इस दीपावली पर अपने घर के सामने दो-दो दीपक जलाने की अपील की। इससे भगवान राम के प्रसन्न होने की बात भी कही।
इस तरह वह राम को आम गरीबों से जोड़ते नजर आए। जैसे वह समझाना चाह रहे हों कि गरीबों का घर में खुशहाली का उजाला ही रामराज की कल्पना है। जिस पर वह चल रहे हैं। इसका आधार हिंदू-मुसलमान नहीं बल्कि सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास है।
प्रधानमंत्री लखनऊ में थे, सो उन्होंने अटल के सहारे समीकरणों को दुरुस्त करने के एजेंडे पर भी कोई चूक नहीं की। अब यह निर्णय करने वाले जाने कि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर चेयर बनाने के पीछे कोई रणनीति उद्देश्य रहा या यह सामान्य निर्णय है। बावजूद इसके प्रधानमंत्री ने जब अटल के कामों और विपक्ष की तरफ से की गई उनकी आलोचनाओं का उल्लेख करते हुए इस चेयर के महत्व को समझाया तो संकेतों में ही सही वह आंबेडकर की विरासत के साथ अटल और भाजपा को जोड़ते नजर आए।
इसमें शोषित व वंचितों को सम्मान दिलाने की चिंता शामिल थी। रही बात सरोकारों की तो मोदी लखनऊ में थे, इसलिए उन्होंने अटल व लखनऊ के रिश्तों को जोड़ते हुए और खुद को इसी प्रदेश से सांसद होने का सौभाग्य प्राप्त होने की बात कहते हुए भावनाओं के सरोकारों से भी 22 के एजेंडे को धार देने में चूक नहीं की।
अर्थशास्त्री प्रो. अंबिका प्रसाद तिवारी जो कुछ कहते हैं उससे प्रधानमंत्री के भाषण के निहितार्थ और अच्छी तरह समझे जा सकते हैं। तिवारी के अनुसार उत्तर प्रदेश में नगरीय आबादी इस समय लगभग छह करोड़ है। इसमें गरीबों का अनुमानत: 26.6 प्रतिशत है। इनमें 44.9 प्रतिशत दलित और 36.6 प्रतिशत पिछड़े अर्थात ओबीसी हैं। लगभग 23.05 प्रतिशत लोग मलिन बस्तियों में रहते हैं। समझा जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने संकेतों के जरिए विपक्ष के सामने वर्ष 2022 के लिए कितनी बड़ी चुनौती खड़ी करने के एजेंडे पर काम की शुरुआत कर दी है।