400 साल पुरानी लोकनाट्य विधा ‘भगत-वध विरुद्घ’ के जरिए पशुवध के खिलाफ यह आवाज उठाई गई भारतेंदु नाट्य अकादमी के थ्रस्ट थियेटर में।
जहां जनजाति एवं लोककला संस्थान की ओर से दो दिवसीय नाट्य समारोह के समापन में आगरा की रंगलीला संस्था व अखाड़ा दुर्गदास की ओर से भगत का मंचन किया गया।
गायन, वादन और अभिनय से भरपूर यह भगत दर्शकों को पसंद आई। भगत का लेखन 95 वर्षीय वयोवृद्ध भगत गुरु फूलसिंह यादव व परिकल्पना अनिल शुक्ल की रही।
संवाद शलभ भारती, वेशभूषा मानवी वर्मा की रही।
इसके अलावा मंच पर राकेश यादव(नेमिनाथ), नेहा(राजुल), दीपक सागर(श्रीकृष्ण), काजल गुप्त(जामवंती), योगेन्द्र दुबे(कवि), पतोलाराम(राजा उग्रसेन), शिवम(दूत), करन(बावर्ची), पीयूष व शिवम(दरबारीगण) बने।
इसके अलावा वाद्ययंत्रों में हारमोनियम पर फूलसिंह यादव, ढोलक पर यशपाल, नगाड़े पर मोतीलाल, चंग रमेश कलाजी, कटोरी गोपाल शर्मा, घंटे पर अनिल शुक्ल ने संगत की।