जागरूकता की कमी से अब भी 67 प्रतिशत आईएलडी मरीजों को टीबी की दवा दी जा रही है। आईएलडी 140 बीमारियों का समूह है, इस बीमारी की पहचान आसानी से हो जाती है।
कुछ 20 प्रतिशत बीमारियों का इलाज भी संभव है। जो जानकारियां मिली हैं, उनमें कबूतर के पंख, जानवरों के बालों पर पाए जाने वाले रूसी ड्रग्स, फफूंद और वातावरण में पाए जाने वाले प्रदूषण प्रमुख कारण है। यह बीमारी भारत ही नहीं पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रही है। भारत में बीते दो साल की ओपीडी में 800 मरीज पंजीकृत हुए हैं।
एरा मेडिकल कॉलेज के पल्मोनरी मेडिसिनि के विभागाध्यक्ष प्रो. राजेन्द्र प्रसाद ने बताया कि आईएलडी अमेरिका से आई थी। यह बीमारी पहले एक लाख आबादी में 30 लोग को अपनी चपेट में लेती थी। अब आबादी बढ़ने से रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि यह रोग अन्य बीमारियों की दवाओं के साइड इफेक्ट के रूप में भी हो जाती है। इसलिए जीने चढ़ने पर सांस फूलने लगती है और सूखी खांसी आती है तो तुरंत विशेषज्ञ से परार्मश लें।
पहचानें लक्षण
- सूखी खांसी आना,
- नाखूनों में सूजन
- जोड़ों में दर्द
- सांस फूलना