श्लोक, मंत्र का उच्चारण करते वक्त सांस की गति पर नियंत्रण जरूरी होता है। इससे दिमाग को संदेश देने वाले न्यूरॉन्स में धीरे-धीरे बदलाव शुरू हो जाता है। कुछ समय बाद बदलाव स्थायी हो जाता है। इससे दिमाग अधिक सक्रियता से कार्य करने लगता है।
इस तरह दिखे बदलाव
डॉ. कुमार ने बताया कि मंत्रोच्चार करने वालों में मस्तिष्क की मेमोरी (हिप्पोकेंपस) का स्कोर सामान्य की अपेक्षा ज्यादा मिला। जब इंसान अवसाद में होता है तो ये हिप्पोकेंपस मरने लगते हैं। इसी तरह लिखने, समझने व किसी बात को संग्रह करने वाले हिस्से (थैलमस) में ग्रे मैटर ज्यादा मिला। इससे स्पष्ट है कि वैदिक अध्ययन करने वालों में सकारात्मकता व याददाश्त तेज होती है। इनमें ब्रेन न्यूरॉन्स की मोटाई ज्यादा मिली, जिससे उन्हें संदेश जल्दी पहुंचता है। उच्चारण को नियंत्रित करने वाले लेफ्ट इंसुला के ज्यादा सक्रिय होने की वजह से उच्चारण की शुद्धता बढ़ जाती है। एंगुलर गायरिस में हुए बदलाव की वजह से रिकॉल क्षमता ज्यादा हो जाती है। लगातार मंत्रोच्चार से मस्तिष्क के मध्य स्थित संदेशवाहक न्यूरॉन्स ज्यादा सक्रिय मिला जो याददाश्त के साथ जवाब देने की क्षमता बढ़ाता है।
कोरोना काल में ऐसे मिलेगी मदद
डॉ. कुमार बताते हैं कि कोरोना काल में लोगों में मानसिक समस्या बढ़ी है। ऐसे में उनके इलाज के लिए तैयार होने वाले नए प्रोटोकॉल को बनाने में इस अध्ययन से मदद मिलेगी। उनके रिहैबिलिटेशन में मदद मिलेगी।