बातचीत में अभय बताता है कि मजदूरी करने एक महीने पहले ही साथी रामदयाल के साथ झांसी गया था। अभी काम मिला भी नही था कि लॉकडाउन हो गया। शुरुआत में लगा की हालात संभल जाएंगे तभी जब लोग भाग रहे थे, हम रुक गए। अब न तो पैसे बचे न खाने का साधन तो अपने गांव की ओर पैदल ही निकल पड़े।
अभय बताता है कि कई जगह कुछ दयालु लोगों ने खाना पानी दे दिया। एक ट्रक वाले ने भी मुफ्त में कई किलोमीटर का सफर भी करवाया।
झांसी से कई किलोमीटर आगे (जगह का नाम पता नही) एक कार वाली आंटी ने पानी की एक बोतल दी। सफर के दौरान अब नल से पानी भर कर रख लेते हैं। रामदयाल बताता है कि जो भी समान था लॉकडाउन के बाद से धीरे धीरे सब खत्म हो गया। कई जगह पर पुलिस ने भी खाने पीने का सामान उपलब्ध करवाया।
हालात ठीक होंगे तब भी नही छोड़ेंगे गांव:
अभय कहता है कि शहर की चकाचौंध अब जिंदगीभर डराएगी। जब करोना का डर खत्म हो जाएगा तब भी गांव नहीं छोड़ेंगे। दो की जगह एक टाइम का खाना भी गांव में मिला तो भी सुकून से जी लेंगे।