घुंघराले बाले, रहनसहन में सादगी और हंसमुख स्वभाव। बातचीत में भी साफगोई व बेबाकी।
पद्मश्री गज़ल गायिका पीनाज मसानी की यही खासियत है। उनके व्यक्तित्व के दो छोर हैं। एक, दिलकश नज़्में पेशकर महफिलें रोशन करने वाली गज़ल गायिका का।
दूसरा, कुपोषण व भ्रूणहत्या जैसे गंभीर मुद्दों को पुरजोर ढंग से उठाने वाली सामाजिक कार्यकत्री का।
आगरा घराने के अमानत हुसैन खानसाहब व गज़ल गायिक मधुरानी से शास्त्रीय संगीत व गायकी सीखने वाली पीनाज मुहम्मद रफी की मुरीद हैं। रविवार को वह शहर में आईं तो अमर उजाला ने उनसे बात की।
पिछड़ जाती है गजल
आपके अल्फाजों में गज़ल गायकी के क्या मायने हैं। गज़ल किस दौर से गुजर रही है?
-गज़ल ज़िंदगी है। जिसमें शायर अपनी जिंदगी की जद्दोजहद को लिखकर रूहानियत पैदा करते हैं। कहती हैं कि जब उन्हें दर्शकों का चस्का लगा है। इसलिए प्रस्तुतियां श्रोताओं की मांग के अनुसार ही देती हैं।
जहां तक बदलावों की बात है-हर आर्ट फॉर्म का दायरा होता है। मसलन, 90 के दशक का दौर गज़लों का था। फिर पापुलर म्यूजिक आया। इसके बाद तेजी से गज़लों की वापसी हुई। गज़लों का प्रमोशन टेलीविजन पर ठीक से नहीं हो रहा। टीआरपी के फेर में गजल पिछड़ जाती है।
'मैं फैशन आइकन नहीं हूं'
आपका लुक भी हमेशा चर्चा में रहता है। इसलिए लुक और अपनी आवाज की देखभाल कैसे करती हैं?
-(हंसते हुए...) मैं फैशन आइकन नहीं हूं। ‘आई हेट ड्रेसिंग...’ घर व फैशन शो वगैरह में भी आरामदायक कपड़े ही पहनती हूं।
युवा गज़ल गायकों को किस स्तर पर पाती हैं। कमियां हैं तो सुधार के उपाय क्या हैं?
-(गंभीरता से) देखिए...रिएलटी शो के कारण युवा प्रतिभा के सामने समस्याएं खड़ी कर दी हैं। रिएलटी शो से निकलने वाले कलाकार अमूमन सालभर में ही गुमनामी के अंधेरों में खो जाते हैं।
दिक्कत यह है कि युवा क्लासिकल म्यूजिक नहीं सीखते। दूसरे, पैसों व ग्लैमर की चकाचौंध से दूर तनमयता व लगन से गज़ल सीखने की जरूरत है।
'लंबे समय से संघर्ष कर रही हूं'
गजल गायिका से इतर आप एक सामाजिक कार्यकत्री भी हैं। उसके बारे में बताइए?
-मंच से अलाहिदा वक्त निकालकर सामाजिक कार्यों में जुट जाती हूं। भ्रूणहत्या और कुपोषण दो ऐसे मुद्दे हैं, जिसे दूर करने के लिए लम्बे अरसे से संघर्ष कर रही हूं।
गांवों की दुर्दशा आज भी एक गंभीर मुद्दा है, जिसे संसद में उठाया जाना चाहिए। बच्चों और उनकी माओं के पास खाने के लिए मुट्ठी भर अनाज नहीं होता।