दंगे की आग में झुलसे शामली जिले के कुड़ाना गांव में रिटायर्ड फौजी सतेंद्र मलिक ने गुरुवार को अपने बचपन के दोस्त रहीसू की बेटी अनवरी का निकाह करवाया।
हाथ जोड़कर बारातियों की आवभगत की और अनवरी की विदाई अपने घर से कराई। निकाह का सारा खर्च भी खुद उठाया। इस काम में उनकी पत्नी व बेटा भी मन से लगे रहे।
मुजफ्फरनगर के बसीकलां में हाजरा नामक महिला को दंगे के दौरान 15-20 दिन की एक बच्ची पड़ोस में गन्ने के खेत के पास मिली।
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पांच बच्चों की मां हाजरा उसे घर ले आई और अब दिन भर उसे छाती से लगाए घूमती है। कहती है दिलोजान से इसकी परवरिश करूंगी। इसे अल्लाह ने मेरे पास भेजा है।
कहा जा रहा है कि दंगे के दौरान जान बचाकर भाग रहे मां-बाप से बच्ची बिछड़ गई है। चूंकि उसे लेने अभी तक कोई नहीं आया, इसलिए कयास लगाया जा रहा है कि इसके मां-बाप शायद इस दुनिया में भी नहीं हैं।
महज ये दो घटनाएं ही नहीं, इस बीच तमाम ऐसे वाकये सामने आए हैं जिनसे विपरीत स्थितियों में भी इंसानियत के जिंदा रहने के सुबूत मिलते हैं।
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मुजफ्फरनगर में तो आजकल यूनीफॉर्म पहने छोटे-छोटे स्कूली बच्चे राह चलते लोगों को गुलाब के फूल देकर नफरत छोड़ अमन का पैगाम फैलाने की नसीहत देते फिर रहे हैं।
उम्र में खुद से बड़ी लड़कियों से कह रहे हैं -दीदी स्कूल न छोड़िए, आइए आपको कुछ नहीं होगा। नन्हे-मुन्नों की इस मासूम अपील को कोई खारिज नहीं कर पा रहा है।
‘अस्तित्व’ संस्था की रेहाना कहती हैं, ‘घाव गहरे हैं, भरने में समय लगेगा पर इस माहौल में टिमटिमाते दीए की लौ ही रोशनी के लिए बहुत है’।
मुजफ्फरनगर तो सामान्य होने की दिशा में लौटने लगा है, पर खेड़ा में उपद्रव के बाद मेरठ के आसपास के ग्रामीण इलाकों में तनाव फैल रहा है।
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मलियाना-हाशिमपुरा का दंगा रहा हो या अयोध्या आंदोलन के उफान का समय, हर दौर में इस मिजाज के लोग आए और आग में पानी डालने का काम किया।
पुराने लोगों को याद है एनएएस पीजी कॉलेज के राजनीति विज्ञान के विभागाध्यक्ष डॉ. हरपाल सिंह का जज्बा। 26 साल पहले 1987 में मेरठ में दंगा भड़का तो मरीजों का इलाज करने गए उनके इकलौते नौजवान बेटे डॉ. प्रभात सिंह को दंगाइयों ने मार डाला।
इस हृदय विदारक घटना के बावजूद डॉ. हरपाल ने अपने जज्बे को बिखरने नहीं दिया। बेटे की मौत के बाद भी वे भाईचारा कायम रखने के लिए खड़े हुए।
उन्होंने कहा था, प्रभात को न हिंदू ने मारा है न मुसलमानों ने, उसे दंगाइयों ने मारा है। उम्र के अंतिम पड़ाव पर चल रहे डॉ. हरपाल सिंह अभी भी सामाजिक एकता और भाईचारे की वकालत में किसी से पीछे नहीं हैं।
मेरठ छोड़कर अब भोपाल में रह रहे मशहूर शायर बशीर बद्र भी नहीं भूले कि उस दंगे में जब शास्त्रीनगर मोहल्ले में उनका घर जलाया जा रहा था तो दंगाइयों से लोहा लेने के लिए पड़ोसी हिंदू ही सामने आए थे।
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इस जहर बुझे माहौल में भी कुछ लोग ऐसे हैं जो अमन का राग अलापने की कोशिश में लगे हुए हैं।
मेरठ के वरिष्ठ अधिवक्ता तौसीफ अली खान कहते हैं कि आग न लग जाए घरों के ही चिराग से, इसलिए अमनपसंद लोगों को अपने घरों की चौखटों से निकलकर सड़क पर आना होगा कहना होगा कि भाईचारे को नफरत की सियासत की भेंट नहीं चढ़ने देना है।
लेखक और वकील मुनेश त्यागी कहते हैं सारा किया धरा सियासत का है। कोशिश असल मुद्दों से ध्यान हटाकर हिंदू-मुस्लिम कार्ड पर चुनाव की वैतरणी पार करने की है।