गठबंधन सरकारें अगर आज की मजबूरी हैं तो क्या कोई ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए जो न केवल स्थिर बल्कि जनता का भला कर पाने में सक्षम हो।
जो लोकतांत्रिक व्यवस्था का मखौल नहीं उड़ाए। इन्हीं सवालों को उठाया ‘चाणक्याज न्यू मेनिफेस्टो’ के लेखक पवन वर्मा ने।
उन्होंने कहा, हर चुनाव के बाद गठबंधन दलों की संख्या बढ़ती जाती है। 20-20 पार्टियां मिलकर सरकार चलाती हैं। ऐसे में सरकार का पूरा जोर खुद के बचाने पर होता है। ऐसी सरकार देश का क्या भला कर सकती हैं?
लखनऊ लिटरेचर कार्निवाल के दूसरे दिन अपनी पुस्तक पर चर्चा के दौरान वर्मा ने कहा, आज मेजॉरिटी स्लिम होती जा रही है। गठबंधन दलों की संख्या बढ़ती जा रही है। चुनाव बाद गठबंधन होते हैं।
ऐसे में लोकतांत्रिक व्यवस्था कहां रह जाती है। वोटर ने जिस दल को नापसंद कर दूसरे दल को वोट दिया वही नापसंद वाले दल से गठबंधन कर सरकार में शामिल हो जाता है।
वहीं सरकार पर हर समय खतरे की तलवार लटकती रहती है। जिससे सबसे ज्यादा ऊर्जा वह अपने बचाव में ही लगाती रहती है।
चुनाव के पहले हो गठबंध्ान
बिना गुड गवर्नेंस के डेमोक्रेसी की कल्पना कैसे की जा सकती है। इस सबका एक ही समाधान है। चुनाव के पहले गठबंधन हो। उनका एक एजेंडा तय हो। साथ ही यह तय हो कि तीन साल तक घटक दल समर्थन वापस नहीं ले सकते। अगर कोई घटक दल वापस ले तो एंटी डिफेक्शन लॉ के तहत कार्रवाई हो।
हर दल चुनाव मैदान में अपना मेनिफेस्टो लेकर जाते हैं। उनमें लोक लुभावन वादे होते हैं। लिहाजा मेनिफेस्टो के बजाय एजेंडा तय किए जाएं और उसमें लॉन्ग टर्म और शॉर्ट टर्म गोल बताए जाएं।
यह पूरी तरह से रखा जाए कि जीतने के बाद हमारी सरकार बनती है तो हम इस साल यह करेंगे, और आगे के सालों में ये काम।
पहले तय हो पीएम कौन होगा
वर्मा ने कहा नेतृत्व पहले से तय होना चाहिए। जनता उस पर अपना फैसला सुनाएगी कि आखिर उनका नेतृत्व उसे पसंद है या नहीं। वर्मा ने कहा, लालू यादव जेल गए तो पत्नी को चीफ मिनिस्टिर बनवाने में वह कामयाब हो गए। आखिर किस सभ्यता में हम जी रहे हैं जहां चीजें थोप दी जाती हैं।
इसके लिए मतदाता को अवेयर होना होगा। सिर्फ गुस्सा दिखाने से काम नहीं चलेगा। गुस्सा सही दिशा में दिखाने की जरूरत है।