केजीएमयू में मरीजों को फ्री दवा के साथ ही वेलफेयर सोसाइटी की दुकानों पर सस्ती दवा उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी फेल हो गई।
तीमारदार सस्ती दवा के लिए वेलफेयर सोसाइटी के मेडिकल स्टोर पर लाइन में लगे रहते हैं।
जब उनका नंबर आता है तो आधी दवा देकर बाकी बाहर से लेने की सलाह सोसाइटी की दुकानों से दी जाती है।
जबकि सोसाइटी की दुकानों की शुरुआत मरीजों को 26 प्रतिशत छूट पर दवाएं उपलब्ध कराने के लिए की गई थी।
निलमथा निवासी सर्वेश सिंह ने बताया कि वह पत्नी विभा सिंह को ओपीडी में दिखाने आए थे।
डॉक्टर ने पांच दवाएं लिखीं लेकिन उसमें से तीन वेलफेयर सोसाइटी की दुकान पर नहीं मिली।
सीतापुर बिसवां के रहने वाले प्रेम कुमार (55) ने बताया कि दो हफ्ते में तीन बार केजीएमयू आए लेकिन एक बार भी पूरी दवा फॉर्मेसी से नहीं मिली।
बाहर से दवा खरीदने में 3800 रुपये खर्च हो गए। बाल रोग वार्ड में भर्ती जगदीशपुर के सुफियाना (11) को इलाज करने वाले डॉक्टर ने बुखार की ‘क्रोसिन’ दवा लिख दी।
पिता मोहम्मद सलीम ने बताया कि आधे घंटे लाइन में लगने के बाद नंबर आया तो कर्मचारी ने बताया कि दवा नहीं है बाहर से खरीद लो।
इसी तरह मोहनलालगंज, गनियार के रहने वाले रामकुमार (55), लखीमपुर खीरी के रहने वाली कृष्णा देवी (55) जैसे सैकड़ों मरीजों को वेलफेयर सोसाइटी की दुकानों पर दवा न मिलने के कारण अधिक पैसा खर्च करना पड़ रहा है।
वेलफेयर सोसाइटी की फार्मेसी में तैनात फार्मासिस्ट अपनी दवाएं भी मरीजों को बेच रहे हैं। डॉक्टरों की सेटिंग से ये दवाएं वहां सीधे कंपनियों ने उपलब्ध कराई है।
सत्य प्रकाश नाम के एक मरीज ने बताया कि उन्होंने काउंटर पर 166 रुपये जमा किए जबकि बिल सिर्फ 91 रुपये का मिला।
पूछने पर पता चला कि ‘सॉफ्टोवैक’ नाम की दवा फॉर्मेसी के कम्प्यूटर की लिस्ट में नहीं थी, इसलिए उसका बिल नहीं मिला है। हरदोई के रहने वाले श्याम कुमार (55) को लिवर कैंसर है।
जब कीमोथेरेपी और ओपीडी में दिखाने के लिए केजीएमयू आते हैं तो डॉक्टर जो भी लिखते हैं वो वेलफेयर सोसाइटी की फार्मेसी में मिलती ही नहीं है, जबकि कैंसर की दवाएं अस्पताल में मुफ्त मिलने का प्रावधान है।