‘मुझे क्या पता था कि एक गलत रिपोर्ट मेरी जिंदगी बर्बाद कर देगी। मैं एचआईवी पॉजिटिव भी नहीं था। डॉक्टर ने मुझे इसका रोगी बना दिया। मैं और मेरा परिवार किस मानसिक पीड़ा से गुजरा है, बयां नहीं कर सकता हूं। उनके लिए तो यह केवल की चूक थी, लेकिन मेरा सब कुछ बर्बाद हो गया। कारोबार चौपट हो गया। 10 साल के बाद मुश्किल से खुद को फिर खड़ा कर पाने के लिए तैयार कर सका हूं।’
आंसुओं के बीच ये शब्द उस सेहतमंद युवक के हैं, जिसे शहर की एक नामी पैथोलॉजी और डॉक्टर ने गलत रिपोर्ट देकर एचआईवी पॉजिटिव बता दिया था।
नहीं की दोबारा जांच
केजीएमयू के सामने स्थित कोहली पैथोलॉजी एंड ब्लड बैंक और नामी चिकित्सक डॉ. कौसर उस्मान ने यह कारनामा किया। लापरवाही से बनी इस रिपोर्ट को क्रॉस चेक कराने के लिए मेडिकल कॉलेज से जांच कराने की जगह डॉ. कौसर एक साल से ज्यादा समय तक अपना ट्रीटमेंट चलाते रहे।
तमाम शिकायतों के बाद युवक की दोबारा जांच तक नहीं कराई गई। अब उपभोक्ता फोरम प्रथम ने पीड़ित को राहत दिलाते हुए पैथोलॉजी और डॉ. कौसर को मेडिकल नेग्लिजेंस का दोषी करार दिया है।
अब भी सदमे से नहीं उबरा परिवार
फोरम का आदेश आने के बाद जब पीड़ित युवक से संपर्क किया गया तो उसकी रुलाई फूट पड़ी। मूलरूप से बहराइच के इस युवक ने बताया कि उसकी मिठाई की दुकान तक इलाज का खर्च निकालने में बिक गई।
खुद के इलाज के लिए वह अपनी बहन और बहनोई के साथ ठाकुरगंज में रहा। हादसे को दस साल बीत चुके हैं , लेकिन परिवार उस सदमे से आज तक उबर नहीं पाया है। लोग आज भी गलत निगाह से ही देखते हैं। किसी तरह से एक छोटी सी दुकान शुरू की है।
फोरम का आदेश
37 साल के हो चुके युवक को फोरम ने ईदी देने का काम किया। फोरम के अध्यक्ष विजय वर्मा ने आदेश दिया कि डॉ. कौसर को युवक को 1,10,000 रुपये क्षतिपूर्ति देना का आदेश दिया। साथ ही पैथोलॉजी को भी लापरवाही के लिए 10,000 रुपये हर्जाना अदा करने को कहा। इसके अलावा 4,000 रुपये विधिक व्यय के अदा करने होंगे।
क्या था मामला
युवक ने उपभोक्ता फोरम में शिकायत की थी कि पीठ और पैरों में दर्द और वजन कम होने की परेशानी पर उसने डॉ. कौसर उस्मान के शिया कॉलेज के पास विक्टोरिया स्ट्रीट स्थित निजी क्लीनिक पर खुद को दिखाया।
उनके कहने पर कोहली पैथोलॉजी पर एक्सरे और खून की जांच कराई। 7 जून 2002 को मिली रिपोर्ट में उसे एचआईवी पॉजिटिव बताया दिया गया।
इसके बाद एक साल से अधिक समय तक डॉ. कौसर एचआईवी पॉजिटिव का इलाज करते रहे। कोई फायदा नहीं होने पर युवक ने डॉ. अशोक चंद्रा को दिखाया।
रिपोर्ट मिलने तक परिवार हो चुका था बर्बाद
25 दिसंबर 2003 में डॉ. चंद्रा ने युवक का एचआईवी टेस्ट कराया, जिसमें उसे एड्स होने की कोई शिकायत नहीं मिली। यहां तक कि क्रास चेक में भी उसके एचआईवी पॉजिटिव होने का कोई प्रमाण नहीं मिला।
डॉ. चंद्रा की रिपोर्ट थी कि उसे केवल कमजोरी है जिसे डायट सही करने से दूर किया जा सकता है। युवक की शिकायत के मुताबिक वह 2002 से 2004 तक लगातार लखनऊ आता रहा।
इलाज के लिए उसे रुकना भी पड़ता। जब तक उसे एचआईवी पॉजिटिव नहीं होने की रिपोर्ट मिली उसका परिवार बर्बाद हो चुका था।
लापरवाही क्यों, जब यह है सिस्टम
केजीएमयू के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग की अध्यक्ष डॉ. तूलिका चंद्रा का कहना है कि नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन (नाको) के रूल्स के मुताबिक हर संभावित मरीज को आईसीटीसी में रजिस्टर कराना जरूरी है।
यहां जरूरी एलाइजा या रैपिड विधि से जांच के बाद एड्स कंफर्म किया जाता है। इसके बाद आईसीटीसी केस को एंटीरिट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) सेंटर के लिए रेफर कर दिया जाता। यहां सीडी-4, सीडी-8 काउंट टेस्ट किया जाता है।
यह टेस्ट रिएक्टिव मिलने के बाद एआरटी सेंटर में ही उसका मुफ्त इलाज शुरू कर दिया जाता। मरीज के साथ ऐसा नहीं करना लापरवाही है। ऐसे में एक निजी पैथोलॉजी के सहारे एचआईवी जैसा इलाज बिना आईसीटीसी पर रजिस्टर या री-कन्फर्म कराए कैसे शुरू किया जा सकता है।