एक वक्त था जब प्रदेश भर में एक हजार सिंगल स्क्रीन थिएटर हुआ करते थे, जिसमें से आज महज 350 के आसपास ही बचे हुए हैं।
बाकी सरकारी उदासीनता के चलते बंद हो चुके हैं। बांदा, चित्रकूट, बस्ती, कौशाम्बी जैसे ज़िलों सिनेमा हॉल नहीं बचे हैं।
जिससे तमाम कर्मचारी बेरोजगार हो गए हैं।
ये बात लखनऊ सिनेमा हॉल मैनेजर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेश टंडन ने शनिवार को साकार संस्था की ओर से जयशंकर सभागार में ‘उत्तर प्रदेश में सिनेमा और सरकारी नीति’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में कही।
वरिष्ठ रंगकर्मी जुगल किशोर ने कहा कि सिंगल विंडो सिस्टम बनाए जाने की जरूरत है। ताकि फिल्म निर्माण के दौरान आने वाली समस्याओं से निजात मिल सके।
‘रफ़ू चक्कर’ जैसी फिल्म के निर्माता तारिक़ ख़ान ने फिल्ममेकर्स को नसीहत देते हुए कहा कि अच्छा सिनेमा हमेशा पसंद किया जाता रहा है। इसलिए इस ओर काम किया जाना चाहिए।
प्रोड्यूसर विजय तिवारी ने फिल्म के शूट के दौरान आनी वाली सरकारी परेशानियों की ओर सभी का ध्यान दिलाया। पत्रकार संतोष वाल्मीकि ने भी सिंगल स्क्रीन थिएटर की बदहाली पर विचार व्यक्त किए।
संस्था के सचिव अंशु टंडन ने अफसोस जताया कि सिनेमा के सौ साल पूरे होने के बाद भी प्रदेश में सिनेमा को लेकर सरकारी नीति स्पष्ट नहीं है।
संचालन कर रहे अरविंद पांडेय ने कहा कि फिल्म डेवलेपमेंट फंड में जमा तकरीबन 160 करोड़ रुपये का एक हिस्सा सरकार को सिंगल स्क्रीन थिएटर की दशा सुधारने में खर्च करना चाहिए।
अध्यक्षता कर रहे उत्तर प्रदेश सिनेमा एक्जिबिटर्स फेडरेशन के पूर्व अध्यक्ष राम नारायण साहू ने कहा कि गोष्ठी से निकले सुझावों का ज्ञापन मुख्यमंत्री को प्रेषित किया जाएगा।