प्याज को लेकर हाहाकार के हफ्तेभर बाद प्रदेश सरकार की ओर से इसकी कीमतों पर नियंत्रण की दिशा में कवायद शुरू की गई है। प्रमुख सचिव खाद्य-रसद सुधीर कुमार गर्ग के मुताबिक, मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे पर संबंधित विभागों से विचार-विमर्श शुरू कर दिया है।
जल्द इस सिलसिले में मंत्रिपरिषद से निर्णय और सरकार से निर्देश जारी होने की उम्मीद है। प्रदेश में प्याज ही नहीं किसी भी उत्पाद की आपूर्ति जनित कमी से होने वाली महंगाई पर रोक की स्थायी नीति नहीं है।
प्रदेशस्तर पर एक विभाग भी स्वत: कोई कदम उठाने को अधिकृत नहीं। हालत प्यास लगने पर कुआं खोदने जैसी है। अब, जब प्याज की कीमतें बढ़ती जा रही हैं तो सरकार ने अब इस पर नियंत्रण की कवायद शुरू की है।
कैबिनेट की बैठक में प्याज पर होगा फैसला
इस सिलसिले में कैबिनेट से जल्द फैसला होने के संकेत हैं। जिससे प्याज की बढ़ती कीमतों पर रोक के उपाय किए जा सकें और वैकल्पिक बिक्री की व्यवस्था की जा सके।जहां तक खाद्य-रसद विभाग की भूमिका का सवाल है तो सरकार के निर्देश पर यह विभिन्न विभागों से समन्वय कर महंगाई से निपटने के उपाय करता है।
वस्तुओं की वैकल्पिक बिक्री की व्यवस्था कराता है। वैसे डीएम को स्थानीय स्तर पर इन स्थितियों में कालाबाजारी रोकने के अधिकार हैं। वह वस्तुओं की बिक्री नियंत्रित मूल्य पर भी करा सकते हैं। साथ ही मुकदमा दर्ज कराने सहित अन्य कार्रवाई कर सकते हैं। पर, अलग से फंड की व्यवस्था के लिए सरकार की अनुमति जरूरी है।
खाद्य-रसद विभाग के मुख्य विपणन अधिकारी सुधाकर मिश्र के अनुसार, खाद्य-रसद विभाग का काम गरीबी रेखा से नीचे और ऊपर वालों को रियायती कीमतों पर गेहूं व चावल मुहैया कराना है। गरीबी रेखा से नीचे वालों को चीनी वितरण खाद्य-रसद विभाग के माध्यम से होता है।
पूर्व मुख्य विपणन अधिकारी बसंत लाल सिंह के अनुसार, स्थायी व्यवस्था में कई पेंच हैं। वह बताते हैं कि ऐसे मामलों में खाद्य-रसद विभाग को स्वत: कार्रवाई का अधिकार नहीं। उसकी भूमिका सरकार के निर्देशानुसार, समन्वय बनाकर वस्तुओं की आवश्यक वस्तु निगम, कर्मचारी कल्याण निगम, उद्यान विभाग से बात कर वैकल्पिक बिक्री की व्यवस्था करने तक सीमित है।
प्याज के साथ दूसरी चीजें भी होंगी सस्ती
सरकार को यह भी तय करना होता है कि वह मंडियों से मौजूदा थोक भाव पर ही प्याज लेकर नो प्रॉफिट-नो लॉस पर उपलब्ध करवाएगी या उसे रियायती भाव पर देगी। अगर रियायती भाव पर देगी तो उसे अंतर की भरपाई के लिए भी धन की व्यवस्था करनी होगी। एक प्रमुख कारण और है।
प्रदेश में ज्यादातर वस्तुओं के नियंत्रण मुक्त होने से न सिर्फ खाद्य-रसद विभाग बल्कि अन्य विभागों के प्रवर्तन दस्ते भी समाप्त हो गए। साथ ही हस्तक्षेप भी कम किया गया है।
इस तरह की स्थितियों में लोगों को कम दर पर सामान मुहैया कराने वाले कर्मचारी कल्याण निगम और आवश्यक वस्तु निगम ने भी प्रदेश स्तर पर इस सिलसिले में कोई कार्ययोजना नहीं बनाई है।
आवश्यक वस्तु निगम के प्रबंध निदेशक डॉ. राम मनोहर मिश्र और कर्मचारी कल्याण निगम के अधिशाषी निदेशक ए.के. उपाध्याय के मुताबिक, अभी उन्हें सरकार से प्याज की बिक्री के संबंध में कोई निर्देश नहीं मिला।