लखनऊ। एनीमिया के खिलाफ जंग में सरकारी कोशिशें अब भी पूरी नहीं पड़ रहीं हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार हर दो में से एक गर्भवती महिला और तीन में से दो बच्चे एनीमिया से पीड़ित है। डॉक्टरों के अनुसार, जागरूकता से ही इस स्थिति से निपटा जा सकता है।
केजीएमयू की स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ और लखनऊ ऑब्स एंड गाइनी सोसाइटी की सेक्रेटरी प्रो. सीमा मेहरोत्रा ने बताया कि महिलाओं में एनीमिया की वजह से प्रसव के दौरान जटिलताओं और मृत्यु की आशंका दोगुनी हो जाती है। एनीमिक माताओं के बच्चों में भी एनीमिया का खतरा रहता है। ऐसे शिशु समय से पहले या कम वजन के साथ जन्म लेते हैं। इसलिए एनीमिया का खतरा कम करने में सरकारी प्रयासों के साथ ही व्यक्तिगत जागरूकता भी जरूरी है।
समझें, क्या है मातृ एनीमिया
गर्भावस्था के दौरान 11 ग्राम प्रति डेसीलीटर से कम हीमोग्लोबिन स्तर को मातृ एनीमिया कहा जाता है। एनीमिया मां और भ्रूण दोनों तक ऑक्सीजन की आपूर्ति कम कर देती है। इससे संक्रमण, प्रसवोत्तर रक्तस्राव और मातृ मृत्यु का जोखिम बढ़ जाता है।
मातृ एनीमिया से होने वाले खतरे
मातृ मृत्यु, समयपूर्व जन्म, नवजात का कम वजन और मृत-जन्म का जोखिम
एनीमिया के कारण
-भोजन की अपर्याप्त मात्रा का सेवन, अत्यधिक मासिक धर्म या प्रसव के दौरान रक्तस्राव
-प्रोटीन, फोलेट, विटामिन बी-12 और सी की कमी वाला आहार
- मलेरिया, हुकवर्म, टीबी जैसी संक्रमण और दीर्घकालिक बीमारियां
- आनुवंशिक विकार जैसे थैलेसीमिया, सिकल सेल
बचने के लिए इनका रखें ध्यान
- खाना खाने के कम से कम एक घंटे बाद आयरन की गोली खाएं
- आयरन की गोली नियमित रूप से जरूर लें
- गर्भ के चौथे महीने में पेट के कीड़े वाली दवाई जरूर लें
- हीमोग्लोबिन की जांच जरूर कराएं