लखनऊ। रहमानखेड़ा में वन विभाग की तरफ से चलाया गया बाघ पकड़ने का अभियान सुर्खियों में बना है। क्योंकि, करीब 90 दिनों की कड़ी मेहनत और 1 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करने के बाद बाघ को पकड़ने में सफलता मिली। लेकिन विभाग को अभी तक सिर्फ 10 लाख रुपये का ही भुगतान हुआ है। इससे वन विभाग के सामने वित्तीय संकट खड़ा हो गया है।
रहमानखेड़ा और उसके आसपास के इलाकों में बाघ तीन माह तक घूमता रहा। ग्रामीणों की शिकायत के बाद वन विभाग ने बाघ को पकड़ने के लिए अभियान शुरू किया। नजर रखने के लिए कैमरे लगाए गए, ट्रैंकुलाइज गन का इस्तेमाल किया गया। दुधवा नेशनल पार्क से हथिनी डायना व सुलोचना को मंगाया गया।
100 से अधिक कर्मियों की नियमित ड्यूटी रही, दर्जनों वाहन दौड़े, जिस पर पेट्रोल व डीजल का खर्च हुआ। कई विशेषज्ञों को बुलाने के साथ अन्य आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल बाघ को पकड़ने के लिए किया गया। इन सभी पर वन विभाग ने करीब एक करोड़ रुपये खर्च कर दिया।
उपकरण, भोजन व होटल का खर्च महंगा
बाघ को पकड़ने के लिए वन विभाग ने एलईडी, ड्रोन, सर्च लाइट, सीसीटीवी कैमरा सोलर, ट्रैप कैमरा, पावर बैंक, लैपटॉप, प्रिंटर आदि नए उपकरण की खरीद की। कानपुर चिड़ियाघर के विशेषज्ञ डॉ. नासिर व डॉ. नीतीश कटियार, लखनऊ चिड़ियाघर से डॉ. बृजेंद्र, डॉ दयाशंकर दुधवा, डॉ. विनीत आगरा चिड़ियाघर, डॉ. आरके सिंह इटावा के अलावा गोरखपुर व बिजनौर और बंगलूरू से विशेषज्ञ बुलाने के साथ एआई कैमरा मंगाए गए। डीएफओ सीतापुर, डीएफओ बाराबंकी, दो प्रशिक्षु आइएफएस अधिकारी, सीतापुर, बाराबंकी, उन्नाव व लखनऊ रेंज वन विभाग से करीब सौ से अधिक लोगों की टीम रोज तैनात रही। इन सभी के होटल, गेस्ट हाउस में रहने खाने से लेकर वाहन का पेट्रोल, इसके साथ हथिनी डायना व सुलोचना के भोजन पर भी काफी खर्च हुआ। ऑपरेशन बाघ पर हर दिन करीब एक लाख से भी अधिक का खर्च वन विभाग को करना पड़ा।
ऑपरेशन बाघ पर करीब एक करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। अब तक 10 लाख रुपये का भुगतान किया जा चुका है। खर्च का बकाया भुगतान जल्द मिलने की उम्मीद है।
सितांशु पांडेय, डीएफओ लखनऊ