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बुजुर्ग ने लगायी फांसी, सुसाइड नोट में लिखी मन की ये बात

Sat, 14 Oct 2017 03:40 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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लखनऊ के ठाकुरगंज निवासी रामशंकर को वक्त से पहले बूढ़ा बना दिया उनकी अपनी ही औलाद ने। सांस की बीमारी, आर्थिक तंगी से शायद वे इस कदर नहीं टूटते, जितना की उन्हें बेटे की उपेक्षा ने तोड़ दिया। नतीजा, उन्होंने खुद ही मौत को गले लगा लिया। रामशंकर की खुदकुशी की कहानी इसलिए अहम है, क्योंकि यह तमाचा है हमारी सामाजिक व्यवस्था पर।
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धीरे-धीरे एकाकी परिवार की ओर बढ़ रहे लोग, किस कदर बुजुर्गों के प्रति उदासीन हो रहे हैं, यह चिंतनीय  है। घटना बृहस्पतिवार रात की है।  ठाकुरगंज के नेवाजगंज निवासी रामशंकर (55) ने अपने दिल की पीड़ा को कागजों पर उतारा और फांसी लगा ली। ‘मैं बड़े अफसोस के साथ लिख रहा हूं कि मेरा बेटा पैसा लेकर चला गया। मेरे पड़ोसियों ने मेरी खूब देखभाल की, इसलिए मेरा शव उन्हें ही सौंपा जाए....।’

ठाकुरगंज के नेवाजगंज निवासी रामशंकर रसोई गैस के सिलेंडर की रीफिलिंग का काम करते थे। उनकी पत्नी परमेश्वरी की मौत काफी पहले हो गई। इसके बाद आर्थिंक तंगी का दौर शुरू हुआ। कुछ दिनों तक इकलौता बेटा चेतन साथ रहा। उसने भी उम्र के इस पड़ाव और मुश्किल वक्त में साथ छोड़कर चला गया।
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कमरे में पंखे के कुंडे से लगा ली फांसी

डेमो
चेतन अपने परिवार के साथ अलग रहता था। इन दुश्वारियों के बीच राम शंकर को सांस की बीमारी हो गई। इलाज कराने के लिए भी उनके पास पैसा नहीं थे। पड़ोसियों की मदद से दो वक्त की रोटी मिल जाती। उन्हीं की कृपा पर दवा भी चलती थी। आर्थिक तंगी और बीमारी से परेशान रामशंकर ने बृहस्पतिवार रात कमरे में पंखे के कुंडे से फांसी लगा ली। 

सुबह काफी देर तक रामशंकर बाहर नहीं दिखे तो पड़ोसियों ने खिड़की से झांककर देखा। अंदर रामशंकर का शव लटक रहा था। पड़ोसियों ने पुलिस को सूचना दी। मौके पर पहुंची पुलिस ने दरवाजा तोड़कर राम शंकर का शव नीचे उतारा। पिता के मौत की सूचना मिलते बेटा चेतन भी पहुंच गया। घर से लेकर पोस्टमार्टम हाउस तक वह मौजूद रहा। इंस्पेक्टर ने बताया कि शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। रिपोर्ट आने के बाद कार्रवाई की जाएगी।

इंस्पेक्टर ठाकुरगंज दीपक दुबे ने बताया कि कमरे में एक सुसाइड नोट मिला। सुसाइड नोट में राम शंकर ने लिखा कि ‘मैं बड़े अफसोस के साथ लिख रहा हूं कि मेरा बेटा पैसों को लेकर चला गया। मेरी सांस फूलती है। काम नहीं कर पाता हूं। मेरे दो पड़ोसी हरीश और रामनरेश है। दोनों ने मेरा काफी देखभाल किया है। मेरा शव इन पड़ोसियों को सुपुर्द कर दिया जाए।’
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