पुलिस महकमे के एक आईजी बहुत दुखी हैं। असल में अधिकतर पुलिस अफसरों की तरह उनमें पैंतरेबाजी नहीं है। वे खासे शरीफ माने जाते हैं।
लेकिन उनका यही गुण उनके लिए अक्सर नुकसानदायक हो जाता है। हाल ही में उन्होंने अपने एक परिचित के आग्रह पर अपने ही समकक्ष एक अधिकारी से एक सिफारिश कर दी।
साथी अफसर ने उन्हें तमाम दिक्कतें बताते हुए काम करने में असमर्थता जता दी।
कुछ ही देर बाद साहब को पता चला कि उनके साथी अधिकारी ने जिस काम के लिए उन्हें टरका दिया, वैसे ही कुछ काम उन्होंने सियासी सिफारिश के चलते कर दिए हैं।
इस जानकारी के सामने आने पर मायूस आईजी अपने जानने वाले से ही कह बैठे आखिर मैं क्या करूं। किससे कहूं मेरी सुनते ही नहीं।