शिक्षा विभाग में आजकल ईमानदारी की परिभाषा पर चर्चा छिड़ी हुई है। यह चर्चा अनायास नहीं है।
इसके पीछे अफसरों की पीड़ा भी है। विभाग के एक मंत्री ने अपने गृह जिले के कुछ भुगतान के लिए एक अफसर से कहा तो वे ना नुकुर करने लगे। मंत्रीजी ने जब फिर दबाव बनाया तो लंबी छुट्टी पर चले गए।
मंत्री के लोगों ने जब बार-बार फोन मिलाना शुरू किया तो उन्होंने फोन को खामोश कर दिया। अधिकारी मरता क्या न करता। आखिरकार अपनी पीड़ा कई सीनियरों को बताई।
मामला मंत्री से जुड़ा था सो कोई मदद को आगे नहीं आया। अब अधिकारी के लिए एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई थी। मंत्री का कहा करता तो भी मरता और न करता तो भी मरता।