चिकित्सा विशेषज्ञ मानते हैं कि वायरस पानी की फुहारों के जरिए हवा में फैल सकता है। इस प्रक्रिया को शॉवरहेड्स एयरोसॉल ट्रांसमिशन कहते हैं। ऐसे में संक्रमित पानी या सीवेज के लीकेज के दौरान पैदा होने वाली ड्रॉपलेट्स हवा में तैरते हुए संक्रमण का कारण बन सकती हैं। पीजीआई के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. टीएन ढोल कहते हैं कि अपने यहां पेयजल सिस्टम बेहद कमजोर है। लीकेज की समस्याएं बहुत होती हैं। ऐसे में समस्याएं बढ़ सकती हैं।
सवाल- वायरस के बढ़ने में आर्द्रता का क्या रोल होता है?
जवाब- डॉ. टीएन ढोल इस सवाल पर कहते हैं कि बरसात के दिन वायरस और बैक्टीरिया के लिए सबसे मुफीद होते हैं। उमस के दौरान इनकी ग्रोथ तेजी से होती है। इसलिए अगले तीन माह चुनौती भरे हो सकते हैं।
सवाल- क्या हो सकते हैं बचाव के तरीके?
जवाब- डॉ. टीएन ढोल इस सवाल पर कहते हैं कि हॉटस्पॉट वाले इलाकों, अस्पतालों से जल निकासी वाली जगह, वाटर ट्रीटमेंट प्लांट, सीवर आदि के आसपास क्लोरिनेशन को बढ़ाना होगा। ताकि जल की अशुद्धि से होने वाली समस्याओं से बचा जा सके। पानी सप्लाई लाइन में लीकेज की समस्याएं न होने पाएं इसकी व्यवस्था की जानी चाहिए। जलभराव वाले क्षेत्रों में निकासी व्यवस्था दुरुस्त करनी होगी।
एम्स पटना के पूर्व निदेशक और एपिडेमियोलॉजिस्ट डॉ. जीके सिंह इस सवाल पर कहते हैं कि अनलॉक होने के बाद संक्रमण बढ़ेगा। पर, ज्यादातर लोगों के संक्रमित होने से हर्ड इम्युनिटी बढ़ेगी और वायरस बेअसर होने लगेगा। मानसून सीजन के बाद वायरस का असर कम हो सकता है।
ऐसे में इससे डरने के बजाय कमजोर इम्यूनिटी वालों को सावधान रहना होगा। अभी तक जितने भी लोग चपेट में आए हैं उनमें मृत्यु दर बेहद कम है
एसजीपीजीआई के गैस्ट्रोलॉजिस्ट डॉ. अनिल गंगवार बताते हैं कि बारिश में हर साल पेट के मरीज करीब 30 फीसदी बढ़ जाते है। इसकी मुख्य वजह पानी में वायरस और बैक्टीरिया की ग्रोथ होती है। कोरोना वायरस को लेकर भी विदेशी रिपोर्टों में बारिश के दौरान ग्रोथ की बात कही जा रही है।
चूंकि यह पहली बार आया है इसलिए इस पर अभी स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता। वायरस का जो नेचर होता है उससे भी देखा जाए तो बारिश के दौरान इसकी ग्रोथ से इंकार नहीं किया जा सकता। खासतौर से किडनी, लिवर, कैंसर सहित कमजोर इम्यूनिटी वालों को सावधान रहना होगा।