टीबी से जूझ रहे रोगियों के लिए राहत की खबर है। अब उन्हें रोजाना चार तरह की दवाएं नहीं सिर्फ एक ही गोली खानी होगी। जल्दी ही पांच राज्यों में इसे पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया जाएगा। इसके बाद इसे पूरे देश में लागू कर दिया जाएगा। केंद्रीय चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्रालय के उप निदेशक डॉ. देवेश गुप्ता ने ये जानकारी केजीएमयू में पुनरीक्षित टीबी नियंत्रण कार्यक्रम की जोनल टास्क फोर्स की कार्यशाला में बुधवार को दी।
कार्यशाला में डॉ. देवेश गुप्ता ने बताया कि टीबी रोगी को रोजाना चार दवाएं आइसोनियाजिड, रिफामपिन, इथेमबुटाल और पायराजिनामाइड दी जाती है। लगातार छह से नौ महीने तक एक साथ इन चार दवाओं के खाने से मरीज ऊब जाता है। इससे वो दवा से दूर भी भागने लगता है। या फिर उसकी खांसी जैसे ही ठीक होती है तो वो स्वयं को ठीक समझकर दवा बंद कर देते हैं।
अब सभी चार दवाओं को एक गोली के रूप में दिया जाएगा। इसमें मरीज के वजन के अनुसार गोली की मात्रा बढ़ाई या घटाई जाएगी। हिमाचल प्रदेश, केरल, बिहार, महाराष्ट्र और सिक्किम से इस सबसे पहले लागू किया जाएगा। वहां की सफलता के बाद पूरे देश में डॉट्स केंद्र से एक गोली ही मरीजों को खाने के लिए दी जाएगी। डॉ. गुप्ता ने बताया कि 12वीं पंच वर्षीय योजना में पुनरीक्षित टीबी नियंत्रण कार्यक्रम (आरएनटीसीपी) के लिए 12 हजार करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया गया है। इससे देश में टीबी को खत्म करने के लिए चल रहे कार्यक्रम को बल मिलेगा।
केजीएमयू मॉडल से होगी टीबी से जंग
प्रदेश में टीबी नियंत्रण की जंग केजीएमयू मॉडल से होगी। इसमें टीबी के प्रत्येक मरीज का पंजीकरण करना जरूरी होगा। इस पंजीकरण कार्यक्रम से डॉट्स कार्यकर्ताओं के अलावा नर्स, फार्मासिस्ट, आशा, एएनएम व अन्य स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को जोड़ने की सलाह दी गई है। केजीएमयू में इस मॉडल को अक्तूबर से लागू कर दिया गया है।
टीबी नियंत्रण कार्यक्रम के स्टेट टास्क फोर्स के अध्यक्ष और केजीएमयू के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के हेड प्रो. सूर्यकांत ने बताया कि टीबी ही एक ऐसी बीमारी है जिसके प्रत्येक मरीज की स्वास्थ्य मंत्रालय ने सूचना एकत्र करने के निर्देश दिए हैं। केजीएमयू में इसे शुरू कर दिया है। इसके तहत पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के साथ ही सभी विभागों में आने वाली मरीजों को सूचना एकत्र की जाएगी। इस रिकॉर्ड के आधार पर मरीज का फॉलोअप भी हो सके।
टीबी पर नियंत्रण, शोध और विशेषज्ञता के लिए अब मेडिकल कॉलेज मदद करेंगे। आरएनटीसीपी कार्यक्रम के तहत देश भर के 400 से अधिक मेडिकल कॉलेजों से एमओयू साइन किया गया है। नॉर्थ जोन के 62 मेडिकल कॉलेज इसमें शामिल किए गए हैं। जिसमें से अकेले यूपी के 29 मेडिकल कॉलेज हैं। इन मेडिकल कॉलेजों के सहयोग से टीबी नियंत्रण कार्यक्रम में तेजी लाई जाएगी। नेशनल टास्क फोर्स के अध्यक्ष दिगंबर बहेरा ने बताया कि देश के 400 मेडिकल कॉलेज 20 फीसदी टीबी रोगियों का इलाज कर रहे हैं। इनकी मदद से इलाज के साथ ही रिसर्च और पॉलिसी बनाने में मदद ली जाएगी।
गलत इलाज से बढ़ रही बीमारी
प्राइवेट डॉक्टर टीबी के इलाज की डब्लूएचओ की गाइडलाइन का पालन नहीं कर रहे हैं। जानकारी के अभाव में वो दवाओं की गलत मात्रा मरीज को देते हैं, इसलिए टीबी नियंत्रण कार्यक्रम से निजी चिकित्सकों को जोड़ना जरूरी है।
स्टेट टास्क फोर्स के अध्यक्ष प्रो. सूर्यकांत ने बताया कि 50 फीसदी टीबी के मरीज सरकारी और 50 फीसदी निजी चिकित्सकों से इलाज कराते हैं। सरकारी अस्पताल में डॉट्स के तहत इलाज हो रहा है लेकिन निजी डॉक्टर अलग-अलग दवाएं लिखते हैं। इसलिए उन्हें आईएमए, प्राइवेट प्रैक्टिसनर्स एसोसिएशन और नर्सिंग होम एसोसिएशन की मदद से इलाज के लिए प्रशिक्षित करने की जरूरत है।
डॉ. देवेश गुप्ता ने बताया कि टीबी के कुल 22 लाख मरीज हैं। इनमें से 90 हजार एमडीआर (मल्टी ड्रग रजिस्टेंस) के हैं। इन मरीजों की बीमारी के निदान के लिए देश में 300 जीन एक्सपर्ट मशीनें उपलब्ध कराई जा रही हैं। यूपी को भी इनमें से 20 मशीनें मिलेंगी। जीन एक्सपर्ट मशीनों से एमडीआर टीबी की जांच दो घंटे के अंदर संभव है।इससे मरीज का इलाज भी आसान हो सकेगा।