वकीलों का विज्ञापन करने के लिए 18 वेब पोर्टलों को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने नोटिस जारी किया है। साथ ही विधि एवं न्याय मंत्रालय, बार काउंसिल ऑफ इंडिया व अन्य पक्षों को जवाबी हलफनामा दाखिल करने को कहा है।
इस मामले में अधिवक्ता यश भारद्वाज ने याचिका दायर की थी। इसमें बताया था कि इन पोर्टलों द्वारा वकालत के सम्मानित पेशे का निजी आर्थिक हितों के लिए व्यवसायीकरण किया जा रहा है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम 36 व 37 के अनुसार वकालत पेशे के लिए विज्ञापन, दलाली या ग्राहक तलाशने की याचना नहीं की जा सकती।
इससे न्याय देने की प्रक्रिया दूषित हो सकती है। इसके बावजूद 18 पोर्टल इस प्रकार के विज्ञापन जारी कर रहे हैं, वे दावा कर रहे हैं कि उन्होंने देश के अच्छे, श्रेष्ठ और विशेषज्ञ वकीलों को चुना है। यह एक प्रकार का विज्ञापन है जो अन्य वकीलों के मनोबल को भी नुकसान पहुंचाता है।
याची ने कहा कि ये सभी पोर्टल कानून की अनधिकृत एजेंसियों के रूप में काम कर रहे हैं, इन्हें न तो बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अनुमति दी है, न ही प्रदेश की बार काउंसिल ने। किसी राज्य सरकार या केंद्र सरकार से भी उन्हें अधिकृत नहीं किया है। वे अपने व्यावसायिक हितों के लिए वकालत पेशे को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इस प्रकार के विज्ञापनों को नियंत्रित करने के लिए कोई कानून भी नहीं है। ऐसे में कुछ वकील इनका सहारा ले रहे हैं।
इसकी वजह से वकील समुदाय की सत्यनिष्ठा नागरिकों की नजरों में कम हो रही है। जो वकील इन पोर्टल पर जुड़े हैं, वे इनके कर्मचारी भी नहीं कहे जा सकते क्योंकि अगर ऐसा होता वे वकालत नहीं कर पाते। इस बारे में बार काउंसिल ऑफ इंडिया व यूपी बार काउंसिल को याची ने क्रमश: मई 2018 व अगस्त 2017 में जानकारी दी थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। ऐसे में उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
बीसीआई ने जांच के लिए बनाई समिति
सुनवाई के बाद मामले को गंभीर मानते हुए हाईकोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता एसके कालिया को सहयोग के लिए आमंत्रित किया था। वहीं बार काउंसिल, यूपी बार काउंसिल और केंद्र सरकार को अपना जवाब देने के लिए कहा गया था। ताजा सुनवाई में बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने बताया कि उसने मामले की जांच के लिए पांच सदस्यीय समिति बनाई है। इसकी रिपोर्ट आनी बाकी है।
‘फीस बढे़गी’, ऐसा कहकर आकर्षित कर रहे पोर्टल : न्यायमित्र
न्यायमित्र बनाए गए अधिवक्ता एसके कालिया ने कहा कि याचिका में जिन पोर्टलों की जानकारी दी गई है, वे वकीलों को यह कहकर रजिस्ट्रेशन के लिए आकर्षित कर रहे हैं कि ऐसा करने से उनकी फीस बढ़ जाएगी। पेशागत लाभ भी होने लगेगा।
निर्णय में चेतावनी, हो सकती है कार्रवाई
जस्टिस डॉ. देवेंद्र अरोड़ा और जस्टिस राजन रॉय ने सुनवाई के बाद कहा कि याचिका में उठाए गए मामले का गहन परीक्षण करने की जरूरत है। विश्ेाष रूप से उस पक्ष का जिसमें वकीलों को अपना विज्ञापन करने पर आर्थिक लाभ का लालच दिया जा रहा है। यह प्रथम दृष्टया बीसीआई के नियम 36 व 37 का उल्लंघन है।
ऐसे में निर्देश दिए जाते हैं कि सभी प्राइवेट पार्टियों व पोर्टलों को नोटिस जारी किए जाएं। इनका जवाब जल्द से जल्द दिया जाए। मामले की अगली सुनवाई 13 नवंबर को की जाएगी। याची अगर चाहें तो पोर्टलों को ई-मेल पर याचिका का नोटिस भेजें।
इसकी जानकारी हलफनामे में साक्ष्य के तौर पर दाखिल करें। केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय व अन्य पक्ष अगली तारीख से पहले जवाबी हलफनामा दायर करें। अपने निर्णय में हाईकोर्ट ने चेताया भी कि संबंधित पार्टियां बार काउंसिल के नियमों का शब्द व भावना से पालन करें, अगर इससे इतर गए तो कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।