सरकारी अस्पतालों के पैथोलॉजी व एक्स-रे यूनिट से निकलने वाला जहरीला पानी नाले के माध्यम से गोमती तक पहुंच रहा है। अस्पताल में इस पानी को शोधित करने के लिए एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (ईटीपी) होना चाहिए, लेकिन अब तक किसी भी अस्पताल में यह नहीं है।
यह हाल तब है, जबकि एनजीटी की अनुश्रवण समिति सभी अस्पतालों को ईटीपी और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) लगाने का नोटिस भेज चुकी है। समिति ने कचरा निस्तारण के लिए अलग-अलग चार बाल्टी व ईटीपी प्लांट लगाने को कहा है। जांच में अस्पतालों में दोनों प्लांट न मिलने पर एनजीटी इन पर जुर्माना लगाएगा।
बलरामपुर व डफरिन में एसटीपी पर काम शुरू
नोटिस के बाद बलरामपुर व डफरिन अस्पताल में एसटीपी का काम शुरू हो गया, लेकिन दोनों अस्पताल में अब तक ईटीपी लगाने का काम नहीं शुरू हुआ है। ऐसे में पैथोलॉजी-एक्स-रे यूनिट का पानी सीधे बाहर छोड़ा जा रहा है। इसे लेकर एनजीटी की अनुश्रवण समिति ने एक बार फिर अस्पताल को नोटिस जारी किया है।
लोहिया अस्पताल में भी नहीं है ईटीपी
लोहिया अस्पताल में एसटीपी प्लांट लगा हुआ है। अस्पताल के निदेशक डॉ. डीएस नेगी के मुताबिक अस्पताल से निकलने वाला पानी एसटीपी से शोधित करने बाद नाली में छोड़ा जा रहा है। हालांकि यहां भी ईटीपी नहीं है। पैथोलॉजी व एक्स-रे यूनिट से निकलने वाला पानी सीधे बाहर छोड़ा जा रहा है। इसे लेकर भी आपत्ति लगी है।
सिविल में तो प्लांट लगाने की जगह तक नहीं
सिविल अस्पताल में एसटीपी-ईटीपी प्लांट लगाने के लिए जगह तक नहीं है। ऐसे में यहां पर दोनों प्लांट लगना मुश्किल हो रहा है। एनएचएम की ओर से फरवरी में एसटीपी प्लांट लगाने के लिए करीब 12 लाख रुपये बजट भी मिला था। अफसरों का कहना है कि बजट नाकाफी है। वहीं अस्पताल परिसर में जगह भी संकट खड़ा है। एनजीटी के बताए सभी नियमों का पालन सख्ती से कराया जा रहा है।
एनएचएम से बजट मिला है, इसमें एसटीपी व ईटीपी का काम होना है। हालांकि अस्पताल में एसटीपी प्लांट लगाने के लिए जगह अभी नहीं है। लिहाजा उसकी तलाश चल रही है।
डॉ. डीएस नेगी, सिविल, लोहिया निदेशक
अस्पताल में एसटीपी प्लांट ब्लड बैंक के सामने बन रहा है। ईटीपी के लिए अभी कोई बजट नहीं आया है, जल्द ही ईटीपी प्लांट भी लगाया जाएगा।
डॉ. राजीव लोचन, निदेशक, बलरामपुर
पैथोलॉजी का पानी लोगों की सेहत के लिए घातक
पैथोलॉजी में बैक्टीरियल संक्रमण, साल्मोनेला, हैजा, पेचिश, एमडीआर प्रतिरोधी बैक्टीरिया, कैंडिडा और एस्परगिलोसिस जैसे फं गल प्रदूषण, वायरल एजेंट जैसे हेपेटाइटिस वायरस, एचआईवी वायरस, एंटरो वायरस और अन्य वायरल एजेंट निकलते हैं। पैथोलॉजी का पानी सीधे कम्युनिटी से मिलने पर लोगों में संक्रमण होने का खतरा रहता है। ऐसे में पैथोलॉजी के पानी को ईटीपी से शोधित किए जाने बाद भी छोड़ा जाना चाहिए वरना यह लोगों की सेहत संग पर्यावरण के लिए घातक हो सकता है।
डॉ. शीतल वर्मा, माइक्रोबॉयोलाजी, केजीएमयू
यहां एसटीपी प्लांट तक नहीं
- बीआरडी महानगर अस्पताल
- सिविल अस्पताल
- झलकारीबाई अस्पताल
- लोकबंधु अस्पताल
- रानीलक्ष्मीबाई अस्पताल
- साढामऊ अस्पताल, बीकेटी