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Lucknow News: टीबी के नोडल डीआर सेंटर पर दो साल में नहीं भर्ती हुआ एक भी मरीज

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एसजीपीजीआई।
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सचिन त्रिपाठी
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लखनऊ। दवा प्रतिरोधी (डीआर) टीबी पर नियंत्रण के लिए की जा रहीं कोशिशें धरातल तक नहीं पहुंच रही हैं। डीआर टीबी के लिए नोडल सेंटर बनाए गए संजय गांधी पीजीआई में दो साल में एक भी मरीज भर्ती नहीं किया गया। यहां मरीजों को सिर्फ दवाएं दे दी जाती हैं। भर्ती की जरूरत होने पर उन्हें केजीएमयू या अन्य संस्थान रेफर कर दिया जाता है।

टीबी की बीमारी पर प्रभावी नियंत्रण के लिए केंद्र सरकार ने सभी चिकित्सा संस्थानों में दवा प्रतिरोधी टीबी के नोडल सेंटर बनाने का निर्देश दिया था। इसके तहत दिसंबर 2023 में लखनऊ में केजीएमयू, लोहिया संस्थान और एसजीपीजीआई समेत प्रदेश में कुल 24 नोडल केंद्र बनाए गए। गाइडलाइन के अनुसार, सामान्य टीबी सेंटर को न्यूनतम चार और नोडल सेंटर को न्यूनतम 12 बेड पर मरीज भर्ती करने हैं। इसके बावजूद पीजीआई ने एक भी मरीज भर्ती नहीं किया।
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केस 1- 22 वर्षीय युवती (मरीज संख्या- 2025315978) को वर्ष 2025 में संजय गांधी पीजीआई में हुई जांच में दवा प्रतिरोधी टीबी की पुष्टि हुई। हालत गंभीर होने पर उन्हें भर्ती करने की जरूरत थी, लेकिन उन्हें केजीएमयू भेज दिया गया। केजीएमयू में युवती का उपचार चल रहा है।

केस 2-
26 वर्षीय युवक (मरीज संख्या- 2025290385) ने सांस संबंधी समस्या होने पर पीजीआई में दिखाया। जांच में उन्हें कई दवाओं से प्रतिरोधी टीबी की पुष्टि हुई। इसके बाद उन्हें केजीएमयू भेज दिया गया।
केस 3-
75 वर्षीय बुजुर्ग (मरीज संख्या- 2025290385) क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) की समस्या के साथ 18 जून 2025 को भर्ती हुए थे। इलाज के दौरान उन्हें कई दवाओं से प्रतिरोधी टीबी की पुष्टि हुई। इसके बाद उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया। अब वह केजीएमयू से इलाज करा रहे हैं।



नोडल सेंटर बनने के बाद मिला विशेष लैब के लिए बजट

पीजीआई को नोडल सेंटर बनाए जाने के बाद माइक्रोबायोलॉजी विभाग में विशेष लैब बनाने के लिए करीब एक करोड़ रुपये का बजट मिला। इस लैब से सामान्य के साथ दवा प्रतिरोधी टीबी की जांच की सुविधा शुरू हो गई। लैब शुरू होने के बाद टीबी की जांच तो हो रही है, लेकिन गंभीर मरीजों को भर्ती नहीं किया जा रहा है।
दवा प्रतिरोधी टीबी के बारे में

टीबी की बीमारी माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस बैक्टीरिया से होती है। यह मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करती है, लेकिन बाल और नाखून को छोड़कर शरीर के हर अंग में इसका संक्रमण हो सकता है। टीबी के इलाज के लिए आइसोनियाजिड, रिफैम्पिसिन, पाइराजिनामाइड, एथमब्यूटोल और स्ट्रेप्टोमाइसिन प्राथमिक पहली पंक्ति की दवाएं हैं। अगर किसी मरीज में इनमें से रिफैम्पिसिन और आइसोनियाजिड समेत कोई दवा काम नहीं करती है तो उसे दवा प्रतिरोधक टीबी कहा जाता है। ऐसे में अगली पंक्ति की दवाएं चलानी पड़ती हैं। यह स्थिति सामान्य के मुकाबले रोग के गंभीर होने की निशानी है।




Iसंस्थान को नोडल सेंटर बनाने की बात कही गई है, लेकिन अभी तक मरीज भर्ती करने के लिए कोई बजट नहीं मिला है। संस्थान में इसके लिए अलग से वार्ड बनाना होगा, क्योंकि टीबी मरीजों को केंद्रीकृत वातानुकूलित कक्ष में नहीं रखा जा सकता।I
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I- डॉ. आलोक नाथ, विभागाध्यक्ष, पल्मोनरी मेडिसिन विभागI
Iसंस्थान में स्थित डाट्स सेंटर के माध्यम से टीबी के रोगियों को दवाएं दी जा रही हैं। मरीजों का इलाज पल्मोनरी मेडिसिन विभाग में किया जाता है। भर्ती संबंधी व्यवस्था पल्मोनरी मेडिसिन विभाग ही देखता है। I

I- प्रो. प्रेरणा कपूर, प्रभारी, टीबी संजय गांधी पीजीआईI
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