भगवान बुद्ध की प्रतिमा लेकर तपोस्थली का भ्रमण करते श्रीलंका से आए अनुयायी।
कटरा (श्रावस्ती)। बुद्ध की तपोस्थली श्रावस्ती सोमवार को श्रीलंका से आए अनुयायियों से गुलजार रही। तपोस्थली पहुंचे श्रीलंका के 52 सदस्यीय दल ने भिक्षु दीपालोक थेरो के नेतृत्व में गंधकुटी पर अपने पारंपरिक रीति-रिवाज से प्रार्थना की। इस दौरान बौद्ध सभा का आयोजन किया गया। इसके बाद अनुयायियों ने तपोस्थली के विभिन्न स्मारकों का भ्रमण किया।
सभा के दौरान भिक्षु दीपालोक थेरो ने कहा कि वस्तु का निरंतर परिवर्तन होता रहता है। कोई भी पदार्थ एक क्षण से अधिक स्थायी नहीं रहता। कोई भी मनुष्य किसी भी दो क्षणों में एक जैसा नहीं रह सकता। इसलिए आत्मा भी क्षणिक है और यह सिद्धांत क्षणिकवाद कहलाता है। इसके लिए बौद्ध मतानुयायी प्राय: दीपशिखा की उपमा देते हैं। जब तक दीपक जलता है, तब तक उसकी लौ एक ही शिखा प्रतीत होती है। जबकि यह शिखा अनेकों शिखाओं की एक श्रृंखला है। एक बूंद से उत्पन्न शिखा दूसरी बूंद से उत्पन्न शिखा से भिन्न है, लेकिन शिखाओं के निरंतर प्रवाह से एकता का भान होता है। इसी प्रकार सांसारिक पदार्थ क्षणिक है, लेकिन उनमें एकता प्रतीत होती है। यह सिद्धांत नित्यवाद और अभाववाद के बीच का मध्यम मार्ग है। इसके बाद सभी अनुयायियों ने बुद्ध प्रतिमा लेकर गंधकुटी की परिक्रमा की। साथ ही जेतवन सहित सभामंडप, शिवली स्तूप, आनंद बोधि, राहुल कुटी, आनंद कुटी, संघाराम विहार, कच्ची कुटी, पक्की कुटी, पूर्वाराम विहार आदि का भ्रमण किया।