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गायत्री प्रजापति को मंत्रिपरिषद से हटाए जाने की कोई वजह नहीं: हाईकोर्ट

Sun, 23 Oct 2016 09:31 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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गायत्री प्रसाद प्रजापति - फोटो : amar ujala
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हाईकोर्ट ने कहा है कि गंभीर और जघन्य अपराधों के आरोपी को मंत्री बनाने से मुख्यमंत्री को संवैधानिक तौर पर नहीं रोका जा सकता, लेकिन संवैधानिक तौर पर मुख्यमंत्री से अपेक्षा की जाती है कि वे किसी ऐसे व्यक्ति को मंत्री बनाने के लिए राज्यपाल से सिफारिश नहीं करेंगे।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने गायत्री प्रसाद प्रजापति को प्रदेश सरकार द्वारा फिर से मंत्री बनाए जाने के खिलाफ दायर याचिका खारिज करते हुए यह बात कही। हाईकोर्ट का कहना है कि मुख्यमंत्री को किसी व्यक्ति को मंत्री बनाने का पूरा अधिकार है।

अपने निर्णय में चीफ जस्टिस दिलीप बी भोसले और राजन राय ने कहा कि मौजूदा मामले में गायत्री प्रजापति पर याची ने कई गंभीर आरोप लगाए हैं, लेकिन उन्हें मंत्री बनाना पूरी तरह मुख्यमंत्री के क्षेत्र का मामला है, जिनके सुझाव पर राज्यपाल ने मंत्रिपरिषद में उन्हें शामिल किया।
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राज्यपाल को मुख्यमंत्री के सुझाव पर मंत्री को उसके पद से हटाना या मंत्रिपरिषद से बाहर निकालना होता है, जैसा मौजूदा मामले में किया गया। इस तरह के मामले में तभी हस्तक्षेप किया जा सकता है जबकि मंत्री पद पर मौजूद व्यक्ति को किसी संवैधानिक प्रावधान या फिर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत हटाया जा चुका हो। गायत्री के मामले में ऐसा नहीं हुआ है। अपने निर्णय में हाईकोर्ट ने कहा कि याची ने ऐसी कोई वजह नहीं बताई है जिसमें गायत्री को मंत्रिपरिषद में शामिल किए जाने से अयोग्य करार दिया गया हो।
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अदालत के हाथ बंधे हैं

डेमो पिक
हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत के हाथ बंधे हैं। यह मामला गैरन्यायिक है और न्यायिक शक्तियों का सीमित उपयोग ही किया जा सकता है। ऐसे में याचिका खारिज की जाती है। साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया है कि याचिका खारिज किए जाने को गायत्री प्रजापति के कार्यों को सर्टिफिकेशन नहीं समझा जाना चाहिए। न ही याची या किसी भी अदालत, ट्रिब्यूनल, संगठन अथवा आयोग में जारी जांच, कार्यवाही पर इसका विपरीत असर समझा जाए।

याचिका में कहा गया था
याचिका में नूतन ठाकुर ने कहा था कि गायत्री प्रसाद प्रजापति खनन मंत्री थे और उन्हें मंत्रिपरिषद से हटा दिया गया था। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार और यूपी में अवैध खनन के मामलों में सीबीआई जांच कर रही थी, लेकिन उन्हें फिर से मंत्रिपरिषद में शामिल किया गया है।

वे राज्यपाल के समक्ष अपना विश्वास खो चुके हैं और उन्हें इस तरह चलताऊ ढंग से फिर मंत्री नहीं बनाया जा सकता। यह संविधान की भावना के विपरीत है।
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