पांच साल में दो मंत्री, तीन कुलपति भी केजीएमयू में ऑक्सीजन प्लांट चलाने का टेंडर फाइनल नहीं कर पाए हैं। ऐसे में राजधनी में भी गोरखपुर जैसा हादसा हो सकता है।
ऑक्सीजन प्लांट के लिए छह बार टेंडर निकाला गया। कंपनियों ने उसमें भाग भी लिया पर केजीएमयू के प्रशासनिक अधिकारी यह तय नहीं कर पाए कि किस कंपनी को प्लांट के संचालन का जिम्मा दिया जाए।
2012 से एक ही कंपनी को बार-बार प्लांट के संचालन की जिम्मेदारी को बढ़ाया गया। इसका नतीजा है कि प्लांट के रखरखाव में दिक्कतें आ रही हैं।
केजीएमयू में 3500 से अधिक बेड पर मरीजों को भर्ती किया जाता है। इसमें से लगभग 400 पर ऑक्सीजन की ऑपूर्ति होती है। वहीं, ट्रॉमा सेंटर में लगभग 200 बेड पर ऑक्सीजन आपूर्ति की व्यवस्था है।
इसके लिए केजीएमयू के विभागों में 12 ऑक्सीजन प्लांट हैं। लिक्विड ऑक्सीजन टैंक से इन्हीं प्लांट की मदद से मरीजों को बेड पर सीधे ऑक्सीजन आपूर्ति की सुविधा है। इन्हीं प्लांट को चलाने के लिए जुलाई 2014 में पहली बार टेंडर निकाला गया था।
इसमें दो साल के लिए कंपनी को मेडिकल गैस की आपूर्ति, प्लांट व पाइप लाइन की मेंटीनेंस करना था। 2012 में इसकी जिम्मेदारी जीटी इंटरप्राइजेज नाम की फर्म को दी गई थी। इसके बाद 2014 में टेंडर निकला पर इसका रिजल्ट नहीं निकला।
इसके बाद एक के बाद एक छह टेंडर निकाले गए। आखिरी टेंडर वर्ष 2017 में 1 फरवरी को निकाला गया था। इसके बाद भी लगभग छह महीने बीत चुके हैं लेकिन टेंडर फाइनल नहीं हो पाया है।
जर्जर ऑक्सीजन प्लांट से ठप हो सकती है ऑक्सीजन आपूर्ति
किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय में जर्जर ऑक्सीजन प्लांट कभी भी आपूर्ति को ठप कर सकते हैं। पुरानी जर्जर पाइप लाइन और कम्प्रेशर को रिपेयर कर प्लांट चलाए जा रहे हैं।
इसके चलते गैस का प्रेशर भी विभागों तक सही से नहीं जाता है। सबसे बुरी हालत ट्रॉमा सेंटर और पीडियाट्रिक विभाग की है।
केजीएमयू में विभागों में ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए 12 प्लांट हैं। इनमें से कुछ नए, लेकिन बाकी प्लांट पुराने हैं। सबसे बुरी हालत पीडियाट्रिक विभाग और ट्रॉमा सेंटर की है।
पीडियाट्रिक विभाग में तीन साल पहले आधी रात को ऑक्सीजन प्लांट का एक कम्प्रेशर खराब होने से एनआईसीयू और पीआईसीयू में ऑक्सीजन की आपूर्ति रुक गई थी। आनन-फानन बच्चों को छोटे-छोटे ऑक्सीजन सिलेंडर लगाकर जान बचाई गई थी।
इसके बाद 24 घंटे लगकर दोनों कम्प्रेशर की मरम्मत कराई गई थी। इस हादसे के बावजूद चिविवि प्रशासन नहीं चेता। इस प्लांट में कम्प्रेशर मशीनों को बदलने की जरूरत है। यही हाल ट्रॉमा सेंटर के ऑक्सीजन प्लांट का है।
2003 में स्थापित ये ऑक्सीजन प्लांट जिस समय शुरू किया गया था उस समय ट्रॉमा सेंटर में बेड की संख्या 50 ही थी। इस समय यह 350 से अधिक हो चुकी है। इसमें ट्रॉमा वेंटिलेटर यूनिट, न्यूरो सर्जरी आईसीयू, पीआईसीयू, एनआईसीयू, पल्मोनरी आईसीयू, मेडिसिन आईसीयू भी शामिल हैं। सभी जगह ऑक्सीजन की 24 घंटे जरूरत है।