लहलहाती फसल बर्बाद हो गई। खुशियों से लेकर उम्मीद तक सब कुछ लुटता रहा। सरकार से कुछ मिला भी तो सिर्फ और सिर्फ कोरा आश्वासन। ऐसे में गम बर्दाश्त नहीं हुआ तो जान दे दी। यही कहानी है राजधानी यानी सरकार से महज 28 किमी दूर स्थित बाराबंकी के किसानों की।
एक पखवाड़े बाद भी सरकार मृतक किसानों के परिवारों को कोई मदद नहीं दे पा रही है। किसान और प्रधान चीख-चीखकर कह रहे हैं कि लेखपाल बर्बाद हुई फसलों का सर्वे करने गांव नहीं पहुंच रहे, लेकिन अफसर हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। खेतों में फसलें बिछी पड़ी हैं, पर ये मानने को तैयार नहीं कि यहां कुछ खास नुकसान भी हुआ है।
प्रभावित गांवों में न विधायक पहुंचे, न मंत्री और न कोई सांसद। लग रहा है सरकार मानो सात समंदर पार बैठी हो। नौकरशाही के कुछ नुमाइंदे पहुंचे भी तो औपचारिकता निभाने। अगर बाराबंकी का यह हाल है तो सूबे के दूर-दराज के इलाकों में मदद के बड़े-बड़े दावों की असलियत का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
किसानों को राहत देने के लिए सरकार ने दो किस्तों में 244 करोड़ रुपये जारी किए। हिदायत दी कि हर हाल में 31 मार्च तक मदद पहुंच जाए, पर हकीकत यह है कि तीन अप्रैल तक महज 90.66 करोड़ की सहायता ही बांटी जा सकी है।