गोमती में बढ़ते प्रदूषण से खफा एनजीटी की अनुश्रवण समिति ने प्रदेश सरकार से 100 करोड़ रुपये की गारंटी जमा कराने की सिफारिश की है। अनुश्रवण समिति के चेयरमैन जस्टिस डीपी सिंह ने एनजीटी को भेजी रिपोर्ट में कहा है कि आदेशों के अनुपालन को गारंटी के लिए यह फंड जमा कराया जाए।
यह भी कहा कि राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार के चलते मुख्य सचिव और अन्य जिम्मेदार अधिकारी संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करने में असफल रहे हैं। इस कारण आज तक नदी प्रदूषण मुक्त नहीं हो पाई।
नदियों एवं जलाशयों के प्रबंधन को बनी अनुश्रवण समिति ने यह सिफारिश पिछले दिनों सचिव व पूर्व जिला जज राजेंद्र सिंह, एडवोकेट कमिश्नर चेतनरायन सिंह और यूपीपीसीबी व सीपीसीबी के अधिकारियों के अलग-अलग निरीक्षण के बाद मिली आख्या के आकलन के बाद की है।
रिपोर्ट में कहा गया कि लखनऊ की नगर निगम सीमा में आबादी 34,75,212 की है। प्रति व्यक्ति रोजाना लगभग 194 लीटर सीवरेज होता है। वर्ष 2018 में लखनऊ में 2,46,375 लाख लीटर सीवरेज निकला।
वहीं, सभी एसटीपी मिलाकर 1,44,349 लाख लीटर सीवरेज ही शोधित कर सके। ऐसे में 1,02,026 लाख लीटर सीवरेज और गंदा पानी ऐसे ही गोमती में बहा दिया गया। इससे जल प्रदूषण अत्यधिक बढ़ा हुआ है।
अनुश्रवण समिति ने अलग-अलग जगहों पर नदी से पानी के नमूने लेकर जांच कराई। इसमें ऑक्सीजन की मात्रा शून्य के करीब मिली, जो खतरनाक है।
अनुश्रवण समिति के सचिव राजेंद्र सिंह का कहना है कि 100 करोड़ का फंड प्रमुख सचिव वित्त अनुपालन गारंटी के रूप में जमा कराना सुनिश्चित कराएंगे।
दो साल में सभी नाले बिना शोधन के नदी में गिरना बंद न हुए तो पर्यावरणीय हर्जाने के रूप में इस राशि को जब्त कर लिया जाएगा। इसका इस्तेमाल गोमती के पर्यावरण सुधार को होगा।
सुबह की सैर से बनाएं दूरी
अनुश्रवण समिति ने लोगों को आगाह किया कि गोमती में प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि इसमें नहाने या नदी किनारे घूमने से परहेज करें। खास तौर पर सुबह नदी किनारे सैर से दूरी बनाएं। यह सेहत के लिए खतरनाक हो सकता है।
पवित्र नदी को बना डाला नाला
समिति का कहना है कि गोमती लखनऊ में सांप्रदायिक सौहार्द की प्रतीक है। इसके पौराणिक महत्व होने के भी साक्ष्य हैं। पुराणों में गोमती को ऋषि वशिष्ठ की पुत्री बताया गया है। इसे पवित्र नदी माना गया है, जिसमें नहाने से मोक्ष मिलता है। खूबियों के चलते अवध के नवाबों ने भी अपनी कोठियां नदी किनारे ही बनाईं। हालांकि, अब इस पवित्र नदी को नाला बना दिया गया है।
11 जिलों से गुजरती है नदी, सभी जिम्मेदार
अनुश्रवण समिति का कहना है कि गोमती का उद्गम पीलीभीत के माधवटांडा से होता है। गोमद ताल से नदी की धारा बनने के बाद यह 11 जिलों में 900 किमी की यात्रा करती है। इसके बाद जौनपुर के पास सैदपुर में गंगा में मिल जाती है। गोमती में करीब 33 नालों का गंदा पानी, सीवरेज गिरता है। ऐसे में जरूरी है कि सभी 11 जिलों पीलीभीत, शाहजहांपुर, लखीमपुर खीरी, हरदोई, सीतापुर, लखनऊ, बाराबंकी, फैजाबाद, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़ तथा जौनपुर के डीएम को भी निर्देश जारी किया जाए कि वे अपने यहां लोगों को नदी में नहाने और किनारों पर टहलने से रोकने को जागरूकता फैलाएं। ऐसा तब तक हो, जब तक नदी पूरी तरह प्रदूषण मुक्त न हो जाए। साथ ही सभी डीएम नौ महीने के अंदर अपने जिलों में यह सुनिश्चित करें कि नालों के गंदे पानी को एसटीपी में शोधन के बाद ही नदी में गिराया जाए।
मुख्य सचिव पर भी उठाए सवाल
प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव अनूप चंद्र पांडेय पर भी अनुश्रवण समिति ने सवाल उठाए हैं। मुख्य सचिव ने 26 अप्रैल को एनजीटी के सामने खुद ठोस अपशिष्ट और अस्पताली कचरा के प्रबंधन की जिम्मेदारी ली थी। इसके बाद अनुश्रवण समिति के उपयोग पर उन्हीं को औचित्य तय करना था। समिति का कहना है कि 70 साल में जो सरकार कुछ नहीं कर पाई, अब अचानक इसकी जिम्मेदारी लेना चाहती है।
यूपीपीसीबी भी फेल, 6.84 करोड़ हर्जाना
अनुश्रवण समिति का कहना है कि यूपीपीसीबी अपने गठन के समय से ही गोमती को साफ रखने में पूर्णतया असफल साबित हुई है। उसने कभी भी इसके लिए दोषी नगर निगम और नगर पालिका पर पर्यावरणीय हर्जाना नहीं लगाया। इस संस्थान के विरुद्ध कोई अभियोजन की संस्तुति भी नहीं की गई। प्रदूषण बोर्ड का ऐसा करना उनके अधिकारियों को आईपीसी और पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम 1986 के अंतर्गत अभियोजन के लिए उत्तरदायी बनाता है। समिति ने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के लिए यूपीपीसीबी पर भी 6.84 करोड़ रुपये का हर्जाना वसूलने की संस्तुति की है।
जल निगम, नगर निगम भी भरे हर्जाना
समिति ने एसटीपी, एसपीएस के 24 घंटे न चल पाने और नदी में कूड़ा गिराने के चलते जल निगम पर तीन करोड़ और नगर निगम पर पांच करोड़ रुपये का पर्यावरणीय हर्जाना लगाने की संस्तुति की है। इस फंड का इस्तेमाल अनुश्रवण समिति की निगरानी में गोमती का पानी शुद्ध करने पर खर्च होगा। इसके अलावा नदी को मैला करने के लिए जिम्मेदार बाकी 10 जिलों की नगर निगम या नगर पालिका पर भी एक-एक करोड़ रुपये का पर्यावरणीय हर्जाना लगाया गया है।
नदी के दोनों तरफ निर्माण पर रोक
इसकी भी संस्तुति की गई कि गोमती के दोनों किनारों से 150 मीटर की दूरी तक निर्माण की अनुमति पर रोक लगाई जाए। वहीं, नदी के किनारे किसी भी तरह का कचरा जैसे प्लास्टिक, ठोस अपशिष्ट और अस्पताली कू ड़ा न इकट्ठा किया जाए।
ये सिफारिशें भी आईं
- यूपीपीसीबी, सीपीसीबी की रिपोर्ट के अनुसार नगर निगम, जल निगम तीन माह में विधि अनुसार सभी औपचारिकताओं को पूरा करे।
- नगर निगम और जल निगम एसटीपी बनाने और मुख्य नालों बिना शोधन गोमती से गिरने से रोकने को डीपीआर प्रस्तुत करे।
- सीवेज के उपचार की क्षमता बढ़ाने को जल निगम और नगर निगम सरकार के समक्ष परियोजनाएं प्रस्तुत करें।
- गोमती में शारदा नहर के मोरदैया और अटरिया से अतिरिक्त जल को छोड़ें, जिससे नदी में जल प्रदूषण कम हो सके।
- नदी के आस-पास हरित क्षेत्र को विकसित किया जाए।
- सीतापुर, लखीमपुर खीरी में झील और तालाबों को पुनर्जीवित करें, जिससे गोमती रिचार्ज हो सके।
- नदी से जमा मिट्टी, बालू निकालें, हरित पट्टी बनाए और ठोस तथा प्लास्टिक अपशिष्ट को तुरंत हटाएं।