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अब निकलवाने के साथ ही लगेगा नया दांत

Mon, 08 Feb 2016 01:31 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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हादसे या किसी और वजह से दांत हिलने लगे, आधा टूट जाए तो दांत को निकलवाने के साथ ही नया दांत तुरंत लगाया जा सकता है। ऐसी सुविधा केजीएमयू के प्रोस्थोडॉन्टिक्स विभाग में शुरू हो चुकी है।
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प्रोस्थोडॉन्टिक्स विभाग के डॉ.कौशल किशोर अग्रवाल बताते हैं कि पहले दांत निकालने पर घाव भरने के बाद नया दांत लगाने के लिए मरीजों को करीब छह माह बाद बुलाया जाता था। दोबारा सर्जरी करनी पड़ती थी। इस तकनीक से मरीज को खाने-पीने में अधिक दर्द होता था।

अब इमीडिएट इंप्लांट टेक्नीक की मदद से दो से तीन घंटे में ही मरीजों को राहत मिल जाती है। डॉ कौशल के मुताबिक, इंप्लांट के आकार का मसूड़े में ड्रिल से रूट बनाया जाता है। इससे दांत की लंबाई और चौड़ाई पता चल जाती है।
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इसके बाद मसूड़े के भीतर मौजूद हड्डी के अंदर ड्रिल से तीन चार एमएम का छेद बनाया जाता है। छेद करने के बाद इंप्लांट को उसमें स्क्रू और दो टांके की मदद से टाइट कर देते हैं और कैप (नकली दांत) लगा दिया जाता है।

दांत निकालने के साथ नया दांत लगाने के बाद मरीज को खाने-पीने में कोई दिक्कत नहीं होती है। इस प्रक्रिया में दो से तीन घंटे लगते हैं। डॉ. कौशल बताते हैं कि हर महीने 10 से 12 केस किए जा रहे हैं। मरीजों को कोई परेशानी नहीं हो रही है और सामान्य दांत की तरह ही नकली दांत भी चमकते रहते हैं।

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एक मरीज के लिए एक ही किट

डॉ.कौशल के मुताबिक इमीडिएट इंप्लांट टेक्नीक में इस्तेमाल होने वाले दांत चार हजार से 20 हजार रुपये तक के हैं। वो बताते हैं कि इंप्लांट मरीज के दांत की स्थिति और उम्र के आधार पर तय किया जाता है। इंप्लांट पूरी किट होती है जिसमें ड्रिल मशीन के साथ सर्जरी में इस्तेमाल होने वाले अन्य उपकरण होते हैं। एक मरीज में एक किट इस्तेमाल हो जाती है और उसे डिस्ट्रॉय कर दिया जाता है।

डॉ. कौशल किशोर अग्रवाल बताते हैं कि पीछे का दांत टूट गया हो या निकला गया तो वो चार से छह महीने के बाद ही लगाया जा सकता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पीछे के दांत से व्यक्ति खाने को चबाता है। इसलिए टेंपरेरी इंप्लांट लगाकर स्पेस को फिक्स कर दिया जाता है।

इंप्लांट नॉर्मल होने के बाद परमानेंट इंप्लांट लगा दिया जाता है जिससे ये पता नहीं चल सकता कि ये नकली है या असली।
बच्चों को टेंपरेरी इंप्लांट ही लगेगा। डॉ. कौशल किशोर अग्रवाल बताते हैं कि बच्चों में इमीडिएट इंप्लांट की टेक्नीक इस्तेमाल नहीं की जाती है।

दरअसल, बच्चों के मुंह और मसूड़ों का आकार 18 वर्ष की आयु तक बढ़ता रहता है। ऐसे में बच्चों को टेंपरेरी इंप्लांट का इस्तेमाल किया जाता है। जब उनकी उम्र 18 वर्ष से अधिक हो जाती है तब डॉ.कौशल बताते हैं कि पहले दांत निकालने के बाद तीन से चार महीने में जख्म भरता था।

नकली दांत लगाने के लिए मरीज जब छह महीने बाद पहुंचता था तो मसूड़े के पास इंप्लांट के लिए दोबारा सर्जरी करनी पड़ती थी। नई तकनीक में दांत निकालने के साथ ही जो जगह मसूड़े में बनती है उसी के हिसाब से नया दांत लगा दिया जाता है।

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